Ghazal Poetry (page 877)
असीर-ए-जिस्म हूँ दरवाज़ा तोड़ डाले कोई
आफ़ताब शम्सी
आज़ुर्दगी का उस की ज़रा मुझ को पास था
आफ़ताब शम्सी
पाता नहीं हूँ और किसी काम से लज़्ज़त
आफ़ताब शाह आलम सानी
मेरे गले से आन के प्यारा जो फिर लगे
आफ़ताब शाह आलम सानी
कल का वादा न करो दिल मिरा बेकल न करो
आफ़ताब शाह आलम सानी
कहो बुलबुल को ले जावे चमन से आशियाँ अपना
आफ़ताब शाह आलम सानी
जब वो नज़रें दो-चार होती हैं
आफ़ताब शाह आलम सानी
गो सुध नहीं उस शोख़ सितमगर ने सँभाली
आफ़ताब शाह आलम सानी
घर ग़ैर के जो यार मिरा रात से गया
आफ़ताब शाह आलम सानी
देखो तो किस अदा से रुख़ पर हैं डाली ज़ुल्फ़ें
आफ़ताब शाह आलम सानी
आजिज़ हूँ तिरे हाथ से क्या काम करूँ मैं
आफ़ताब शाह आलम सानी
ये पेड़ ये पहाड़ ज़मीं की उमंग हैं
आफ़ताब इक़बाल शमीम
ये जो ठहरा हुआ मंज़र है बदलता ही नहीं
आफ़ताब इक़बाल शमीम
वो इत्र-ए-ख़ाक अब कहाँ पानी की बास में
आफ़ताब इक़बाल शमीम
वो अपने जुज़्व में खोया गया है इस हद तक
आफ़ताब इक़बाल शमीम
वो आसमाँ के दरख़शिंदा राहियोँ जैसा
आफ़ताब इक़बाल शमीम
वैसे तो बहुत धोया गया घर का अंधेरा
आफ़ताब इक़बाल शमीम
तमीज़-ए-पिसर-ए-ज़मीन व इब्न-ए-फ़लक न करना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
तमीज़-ए-फ़र्ज़ंद-ए-अर्ज़-ओ-इब्न-ए-फ़लक न करना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
रिज़्क़ का जब नादारों पर दरवाज़ा बंद हुआ
आफ़ताब इक़बाल शमीम
फिर बपा शहर में अफ़रातफ़री कर जाए
आफ़ताब इक़बाल शमीम
पंजों के बल खड़े हुए शब की चटान पर
आफ़ताब इक़बाल शमीम
नज़र के सामने रहना नज़र नहीं आना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
नस्लें जो अँधेरे के महाज़ों पे लड़ी हैं
आफ़ताब इक़बाल शमीम
मिसाल-ए-सैल-ए-बला न ठहरे हवा न ठहरे
आफ़ताब इक़बाल शमीम
मैं जब भी छूने लगूँ तुम ज़रा परे हो जाओ
आफ़ताब इक़बाल शमीम
मैं अपने वास्ते रस्ता नया निकालता हूँ
आफ़ताब इक़बाल शमीम
कहीं सोता न रह जाऊँ सदा दे कर जगाओ ना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
कभी ख़ुद को दर्द-शनास करो कभी आओ ना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
जब वो इक़रार-ए-आश्नाई करे
आफ़ताब इक़बाल शमीम