Ghazal Poetry (page 878)

जब चाहा ख़ुद को शाद या नाशाद कर लिया

आफ़ताब इक़बाल शमीम

इश्क़ में ये मजबूरी तो हो जाती है

आफ़ताब इक़बाल शमीम

हज़ीमतें जो फ़ना कर गईं ग़ुरूर मिरा

आफ़ताब इक़बाल शमीम

हर किसी का हर किसी से राब्ता टूटा हुआ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

हाँफती नद्दी में दम टूटा हुआ था लहर का

आफ़ताब इक़बाल शमीम

हाँ उसी दिन धूप में हरियालियाँ शामिल हुईं

आफ़ताब इक़बाल शमीम

इक फ़ना के घाट उतरा एक पागल हो गया

आफ़ताब इक़बाल शमीम

इक चादर-ए-बोसीदा मैं दोश पे रखता हूँ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

दिखाई जाएगी शहर-ए-शब में सहर की तमसील चल के देखें

आफ़ताब इक़बाल शमीम

बात एक जैसी है हज्व या क़सीदा लिख

आफ़ताब इक़बाल शमीम

असीर-ए-हाफ़िज़ा हो आज के जहान में आओ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

अपनी कैफ़िय्यतें हर आन बदलती हुई शाम

आफ़ताब इक़बाल शमीम

ज़रा सी देर को चमका था वो सितारा कहीं

आफ़ताब हुसैन

ये जब्र भी है बहुत इख़्तियार करते हुए

आफ़ताब हुसैन

वो सर से पाँव तक है ग़ज़ब से भरा हुआ

आफ़ताब हुसैन

तुम्हारे बाद रहा क्या है देखने के लिए

आफ़ताब हुसैन

शब-ए-सियाह पे वा रौशनी का बाब तो हो

आफ़ताब हुसैन

क़दम क़दम पे किसी इम्तिहाँ की ज़द में है

आफ़ताब हुसैन

निगाह के लिए इक ख़्वाब भी ग़नीमत है

आफ़ताब हुसैन

मुनाफ़िक़त का निसाब पढ़ कर मोहब्बतों की किताब लिखना

आफ़ताब हुसैन

मक़ाम-ए-शौक़ से आगे भी इक रस्ता निकलता है

आफ़ताब हुसैन

मैं सोचता हूँ अगर इस तरफ़ वो आ जाता

आफ़ताब हुसैन

किसी तरह भी तो वो राह पर नहीं आया

आफ़ताब हुसैन

किसी नज़र ने मुझे जाम पर लगाया हुआ है

आफ़ताब हुसैन

करता कुछ और है वो दिखाता कुछ और है

आफ़ताब हुसैन

कमी रखता हूँ अपने काम की तकमील में

आफ़ताब हुसैन

कहाँ किसी पे ये एहसान करने वाला हूँ

आफ़ताब हुसैन

कभी जो रास्ता हमवार करने लगता हूँ

आफ़ताब हुसैन

जब सफ़र से लौट कर आने की तय्यारी हुई

आफ़ताब हुसैन

इस अँधेरे में जो थोड़ी रौशनी मौजूद है

आफ़ताब हुसैन