Ghazal Poetry (page 885)
उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता
अदा जाफ़री
तौफ़ीक़ से कब कोई सरोकार चले है
अदा जाफ़री
शायद अभी है राख में कोई शरार भी
अदा जाफ़री
रोज़-ओ-शब की कोई सूरत तो बना कर रख्खूँ
अदा जाफ़री
निगाह ओट रहूँ कासा-ए-ख़बर में रहूँ
अदा जाफ़री
न बाम-ओ-दश्त न दरिया न कोहसार मिले
अदा जाफ़री
मुझे रंग-ए-ख़्वाब से ज़िंदगी का यक़ीं मिला
अदा जाफ़री
मिज़ाज-ओ-मर्तबा-ए-चश्म-ए-नम को पहचाने
अदा जाफ़री
क्या जानिए किस बात पे मग़रूर रही हूँ
अदा जाफ़री
कोई संग-ए-रह भी चमक उठा तो सितारा-ए-सहरी कहा
अदा जाफ़री
ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था
अदा जाफ़री
ख़ामुशी से हुई फ़ुग़ाँ से हुई
अदा जाफ़री
ख़लिश-ए-तीर-ए-बे-पनाह गई
अदा जाफ़री
काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या
अदा जाफ़री
कहते हैं कि अब हम से ख़ता-कार बहुत हैं
अदा जाफ़री
जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा
अदा जाफ़री
जब दिल की रहगुज़र पे तिरा नक़्श-ए-पा न था
अदा जाफ़री
होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए
अदा जाफ़री
हिस नहीं तड़प नहीं बाब-ए-अता भी क्यूँ खुले
अदा जाफ़री
हर गाम सँभल सँभल रही थी
अदा जाफ़री
हर इक दरीचा किरन किरन है जहाँ से गुज़रे जिधर गए हैं
अदा जाफ़री
हाल खुलता नहीं जबीनों से
अदा जाफ़री
गुलों सी गुफ़्तुगू करें क़यामतों के दरमियाँ
अदा जाफ़री
गुलों को छू के शमीम-ए-दुआ नहीं आई
अदा जाफ़री
घर का रस्ता भी मिला था शायद
अदा जाफ़री
एक आईना रू-ब-रू है अभी
अदा जाफ़री
दीप था या तारा क्या जाने
अदा जाफ़री
ढलके ढलके आँसू ढलके
अदा जाफ़री
चाक-ए-दिल भी कभी सिलते होंगे
अदा जाफ़री
बेगानगी-ए-तर्ज़-ए-सितम भी बहाना-साज़
अदा जाफ़री