Ghazal Poetry (page 887)

मेहनत से मिल गया जो सफ़ीने के बीच था

अबु तुराब

ये बंदगी का सदा अब समाँ रहे न रहे

अबु मोहम्मद वासिल

तसव्वुरात में इन को बुला के देख लिया

अबु मोहम्मद वासिल

रह-ए-वफ़ा में उन्हीं की ख़ुशी की बात करो

अबु मोहम्मद वासिल

मसरूर हो रहे हैं ग़म-ए-आशिक़ी से हम

अबु मोहम्मद वासिल

कारवाँ इश्क़ की मंज़िल के क़रीं आ पहूँचा

अबु मोहम्मद वासिल

जबीन-ए-शौक़ पर कोई हुआ है मेहरबाँ शायद

अबु मोहम्मद वासिल

हसरत-ए-दीद रही दीद का ख़्वाहाँ हो कर

अबु मोहम्मद वासिल

दिल में उन का ख़याल आता है

अबु मोहम्मद वासिल

अगर मेरी जबीन-ए-शौक़ वक़्फ़-ए-बंदगी होती

अबु मोहम्मद वासिल

आगे वो जा भी चुके लुत्फ़-ए-नज़ारा भी गया

अबु मोहम्मद वासिल

ज़िंदगी ख़ाक-बसर शोला-ब-जाँ आज भी है

अबु मोहम्मद सहर

ज़मीर-ए-नौ-ए-इंसानी के दिन हैं

अबु मोहम्मद सहर

ये तो नहीं कि बादिया-पैमा न आएगा

अबु मोहम्मद सहर

वक़्त ग़मनाक सवालों में न बर्बाद करें

अबु मोहम्मद सहर

सब की आँखों में जो समाया था

अबु मोहम्मद सहर

सब इक न इक सराब के चक्कर में रह गए

अबु मोहम्मद सहर

फूलों की तलब में थोड़ा सा आज़ार नहीं तो कुछ भी नहीं

अबु मोहम्मद सहर

माना अपनी जान को वो भी दिल का रोग लगाएँगे

अबु मोहम्मद सहर

ख़्वाबों का नश्शा है न तमन्ना का सिलसिला

अबु मोहम्मद सहर

खो के देखा था पा के देख लिया

अबु मोहम्मद सहर

काली ग़ज़ल सुनो न सुहानी ग़ज़ल सुनो

अबु मोहम्मद सहर

काम हर ज़ख़्म ने मरहम का किया हो जैसे

अबु मोहम्मद सहर

जब ये दावे थे कि हर दुख का मुदावा हो गए

अबु मोहम्मद सहर

इश्क़ की सई-ए-बद-अंजाम से डर भी न सके

अबु मोहम्मद सहर

हर ख़ौफ़ हर ख़तर से गुज़रना भी सीखिए

अबु मोहम्मद सहर

गोया चमन चमन न था

अबु मोहम्मद सहर

चाँद का रक़्स सितारों का फ़ुसूँ माँगती है

अबु मोहम्मद सहर

बस्तियाँ लुटती हैं ख़्वाबों के नगर जलते हैं

अबु मोहम्मद सहर

अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके

अबु मोहम्मद सहर