Ghazal Poetry (page 889)
मत मेहर सेती हाथ में ले दिल हमारे कूँ
आबरू शाह मुबारक
मत ग़ज़ब कर छोड़ दे ग़ुस्सा सजन
आबरू शाह मुबारक
मगर तुम सीं हुआ है आश्ना दिल
आबरू शाह मुबारक
क्यूँ मलामत इस क़दर करते हो बे-हासिल है ये
आबरू शाह मुबारक
क्यूँ बंद सब खुले हैं क्यूँ चीर अटपटा है
आबरू शाह मुबारक
क्या शोख़ अचपले हैं तेरे नयन ममोला
आबरू शाह मुबारक
क्या बुरी तरह भौं मटकती है
आबरू शाह मुबारक
कोयल नीं आ के कोक सुनाई बसंत रुत
आबरू शाह मुबारक
किस की रखती हैं ये मजाल अँखियाँ
आबरू शाह मुबारक
ख़ुर्शीद-रू के आगे हो नूर का सवाली
आबरू शाह मुबारक
ख़ुदा के वास्ते ऐ यार हम सीं आ मिल जा
आबरू शाह मुबारक
कनहय्या की तरह प्यारे तिरी अँखियाँ ये साँवरियाँ
आबरू शाह मुबारक
कमाँ हुआ है क़द अबरू के गोशा-गीरों का
आबरू शाह मुबारक
कहो तुम किस सबब रूठे हो प्यारे बे-गुनह हम सीं
आबरू शाह मुबारक
कहें क्या तुम सूँ बे-दर्द लोगो किसी से जी का मरम न पाया
आबरू शाह मुबारक
जलते थे तुम कूँ देख के ग़ैर अंजुमन में हम
आबरू शाह मुबारक
जलते हैं और हम सीं जब माँगते हो प्याला
आबरू शाह मुबारक
जाल में जिस के शौक़ आई है
आबरू शाह मुबारक
इश्क़ है इख़्तियार का दुश्मन
आबरू शाह मुबारक
इस ज़ुल्फ़-ए-जाँ-गुज़ा कूँ सनम की बला कहो
आबरू शाह मुबारक
इंसान है तो किब्र सीं कहता है क्यूँ अना
आबरू शाह मुबारक
हुस्न पर है ख़ूब-रूयाँ में वफ़ा की ख़ू नहीं
आबरू शाह मुबारक
हम नीं सजन सुना है उस शोख़ के दहाँ है
आबरू शाह मुबारक
हुआ हूँ दिल सेती बंदा पिया की मेहरबानी का
आबरू शाह मुबारक
हमारे साँवले कूँ देख कर जी में जली जामुन
आबरू शाह मुबारक
है हमन का शाम कोई ले जा
आबरू शाह मुबारक
गुनाहगारों की उज़्र-ख़्वाही हमारे साहिब क़ुबूल कीजे
आबरू शाह मुबारक
गरचे इस बुनियाद-ए-हस्ती के अनासिर चार हैं
आबरू शाह मुबारक
गली अकेली है प्यारे अँधेरी रातें हैं
आबरू शाह मुबारक
फ़जर उठ ख़्वाब सीं गुलशन में जब तुम ने मली अँखियाँ
आबरू शाह मुबारक