Ghazal Poetry (page 891)
अगर तू साथ चल पड़ता सफ़र आसान हो जाता
अबरार हामिद
ज़मीं पे आग फ़लक पर धुआँ दिखाई दिया
अबरार आज़मी
उस ने कल भागते लम्हों को पकड़ रक्खा था
अबरार आज़मी
तुम्हारी बज़्म में जिस बात का भी चर्चा था
अबरार आज़मी
तन्हा उदास शब के सिवा कोई भी न था
अबरार आज़मी
सन्नाटे का दर्द निखारा करता हूँ
अबरार आज़मी
किस का है जुर्म किस की ख़ता सोचना पड़ा
अबरार आज़मी
ख़याल लम्स का कार-ए-सवाब जैसा था
अबरार आज़मी
कमरे में धुआँ दर्द की पहचान बना था
अबरार आज़मी
धूप चमकी रात की तस्वीर पीली हो गई
अबरार आज़मी
बहुत तज़्किरा दास्तानों में था
अबरार आज़मी
ज़मीं नहीं ये मिरी आसमाँ नहीं मेरा
अबरार अहमद
ये यक़ीं ये गुमाँ ही मुमकिन है
अबरार अहमद
ये रह-ए-इश्क़ है इस राह पे गर जाएगा तू
अबरार अहमद
ये भी तो कमाल हो गया है
अबरार अहमद
यक़ीन है कि गुमाँ है मुझे नहीं मालूम
अबरार अहमद
तुझ से वाबस्तगी रहेगी अभी
अबरार अहमद
राह दुश्वार भी है बे-सर-ओ-सामानी भी
अबरार अहमद
क़िस्से से तिरे मेरी कहानी से ज़ियादा
अबरार अहमद
क्या जानिए क्या है हद-ए-इदराक से आगे
अबरार अहमद
कुछ काम नहीं है यहाँ वहशत के बराबर
अबरार अहमद
कोई सोचे न हमें कोई पुकारा न करे
अबरार अहमद
कि जैसे कुंज-ए-चमन से सबा निकलती है
अबरार अहमद
कहीं पर सुब्ह रखता हूँ कहीं पर शाम रखता हूँ
अबरार अहमद
जो भी यकजा है बिखरता नज़र आता है मुझे
अबरार अहमद
हम ने रक्खा था जिसे अपनी कहानी में कहीं
अबरार अहमद
हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है
अबरार अहमद
गुरेज़ाँ था मगर ऐसा नहीं था
अबरार अहमद
इक फ़रामोश कहानी में रहा
अबरार अहमद
और क्या रह गया है होने को
अबरार अहमद