Ghazal Poetry (page 893)

मैं ने लोगों को न लोगों ने मुझे देखा था

आबिद मलिक

क्यूँ चलती ज़मीं रुकी हुई है

आबिद मलिक

कौन कहता है कि वहशत मिरे काम आई है

आबिद मलिक

हज़ार ता'ने सुनेगा ख़जिल नहीं होगा

आबिद मलिक

गले लगाए मुझे मेरा राज़दाँ हो जाए

आबिद मलिक

इक अजनबी की तरह है ये ज़िंदगी मिरे साथ

आबिद मलिक

दश्त में उस का आब-ओ-दाना है

आबिद मलिक

आसूदगान-ए-हिज्र से मिलने की चाह में

आबिद मलिक

आख़िरी बार ज़माने को दिखाया गया हूँ

आबिद मलिक

किसे ख़बर थी कि ख़ुद को वो यूँ छुपाएगा

आबिद ख़ुर्शीद

था मुख़्तसर वजूद जसीम-ओ-जरी न थी

आबिद काज़मी

न हो हयात का हासिल तो बंदगी क्या है

आबिद काज़मी

मक़ाम अपना दुनिया में ज़ीशान रख

आबिद काज़मी

जिन्हें था फ़ख़्र नवाब-ओ-नजीब होते हैं

आबिद काज़मी

इल्तिजा है इज्ज़-ओ-उसरत कुन-फ़कानी और है

आबिद काज़मी

ज़र्द मौसम की हवाओं में खड़ा हूँ मैं भी

आबिद करहानी

दश्त में छाँव कोई ढूँड निकाली जाए

आबिद करहानी

आलम-ए-ख़्वाब सही ख़्वाब में चलते रहिए

आबिद करहानी

ज़मीं से चल के तो पहुँचा हूँ आसमाँ तक मैं

आबिद हशरी

श्याम गोकुल न जाना कि राधा का जी अब न बंसी की तानों पे लहराएगा

आबिद हशरी

न कर्ब-ए-हिज्र न कैफ़्फ़ियत-ए-विसाल में हूँ

आबिद हशरी

वो जो हर राह के हर मोड़ पर मिल जाता है

आबिद आलमी

वो इक निगाह जो ख़ामोश सी है बरसों से

आबिद आलमी

तुम ने जब घर में अंधेरों को बुला रक्खा है

आबिद आलमी

तुम ने जब घर में अँधेरों को बुला रक्खा है

आबिद आलमी

मिरा बदन है मगर मुझ से अजनबी है अभी

आबिद आलमी

क्या ख़बर कब से प्यासा था सहरा

आबिद आलमी

किसी मक़ाम पे हम को भी रोकता कोई

आबिद आलमी

ख़्वाब में गर कोई कमी होती

आबिद आलमी

जो शख़्स तुझ को फ़रिश्ता दिखाई देता है

आबिद आलमी