Ghazal Poetry (page 894)
जब से अल्फ़ाज़ के जंगल में घिरा है कोई
आबिद आलमी
जब भी कमरे में कुछ हवा आई
आबिद आलमी
दे गया आख़िरी सदा कोई
आबिद आलमी
जो कहते हैं किधर दीवानगी है
आबिद अख़्तर
जो अपने आप को सब कुछ समझ ले
आबिद अख़्तर
अपनी कमी से पूछ न उस की कमी से पूछ
आबिद अख़्तर
सुर्ख़ सहर से है तो बस इतना सा गिला हम लोगों का
अभिषेक शुक्ला
सफ़र के बा'द भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए
अभिषेक शुक्ला
लहर का ख़्वाब हो के देखते हैं
अभिषेक शुक्ला
ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता
अभिषेक शुक्ला
हम ऐसे सोए भी कब थे हमें जगा लाते
अभिषेक शुक्ला
फ़सील-ए-जिस्म गिरा दे मकान-ए-जाँ से निकल
अभिषेक शुक्ला
दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें
अभिषेक शुक्ला
चलते हुए मुझ में कहीं ठहरा हुआ तू है
अभिषेक शुक्ला
अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का
अभिषेक शुक्ला
अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है
अभिषेक शुक्ला
राह भटका हुआ इंसान नज़र आता है
अभिषेक कुमार अम्बर
ख़्वाब आँखों में जितने पाले थे
अभिषेक कुमार अम्बर
एक ख़्वाहिश है बस जमाने की
अभिषेक कुमार अम्बर
छोड़ उन को न जाने किधर मैं गया
अभिषेक कुमार अम्बर
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अबीर अबुज़री
ताज़ा-दम जवानी रख
अब्दुस्समद ’तपिश’
पत्ते पत्ते से नग़्मा-सरा कौन है
अब्दुस्समद ’तपिश’
ख़ौफ़-ओ-वहशत बर-सर-ए-बाज़ार रख जाता है कौन
अब्दुस्समद ’तपिश’
जिस्म के मर्तबान में क्या है
अब्दुस्समद ’तपिश’
जफ़ा के ज़िक्र पे वो बद-हवास कैसा है
अब्दुस्समद ’तपिश’
गरचे नेज़ों पे सर है
अब्दुस्समद ’तपिश’
एक भी चैन का बिस्तर नहीं होने देता
अब्दुस्समद ’तपिश’
देख कर मेरी अना किस दर्जा हैरानी में है
अब्दुस्समद ’तपिश’
अगर वो बे-अदब है बे-अदब लिख
अब्दुस्समद ’तपिश’