Ghazal Poetry (page 895)
अभी तक हौसला ठहरा हुआ है
अब्दुस्समद ’तपिश’
आँख थी सूजी हुई और रात भर सोया न था
अब्दुस्समद ’तपिश’
हक़ मिरा मुझ को मिरे यार नहीं देते हैं
अब्दुश्शुकूर आसी
ये मत समझ कि तिरे साथ कुछ नहीं करेगा
अब्दुर्राहमान वासिफ़
ये कौन मेरे अलावा मिरे वजूद में है
अब्दुर्राहमान वासिफ़
रोज़ वहशत कोई नई मिरे दोस्त
अब्दुर्राहमान वासिफ़
मेज़ क़लम क़िर्तास दरीचा सन्नाटा
अब्दुर्राहमान वासिफ़
मज़ीद कुछ नहीं बोला मैं हो गया ख़ामोश
अब्दुर्राहमान वासिफ़
जहान-ए-फ़िक्र पे चमकेगा जब सितारा मिरा
अब्दुर्राहमान वासिफ़
गुमान तोड़ चुका मैं मगर नहीं कोई है
अब्दुर्राहमान वासिफ़
फ़रेब-ए-ज़ार मोहब्बत-नगर खुला हुआ है
अब्दुर्राहमान वासिफ़
दिल में लिए औहाम को इस घर से उठा मैं
अब्दुर्राहमान वासिफ़
अगर तुम रोक दो इज़हार-ए-लाचारी करूँगा
अब्दुर्राहमान वासिफ़
कुछ न किया अरबाब-ए-जुनूँ ने फिर भी इतना काम किया
अब्दुर रऊफ़ उरूज
ख़मोशी मेरी लय में गुनगुनाना चाहती है
अब्दुर रऊफ़ उरूज
जादा-ए-मय पे गुज़र ख़्वाबों का
अब्दुर रऊफ़ उरूज
आज यादों ने अजब रंग बिखेरे दिल में
अब्दुर रऊफ़ उरूज
वो सो रहा है ख़ुदा दूर आसमानों में
अब्दुर्रहीम नश्तर
वो शख़्स जिस ने ख़ुद अपना लहू पिया होगा
अब्दुर्रहीम नश्तर
टूट कर देर तलक प्यार किया है मुझ को
अब्दुर्रहीम नश्तर
सफ़ेद-पोश दरिंदों ने गुल खिलाए थे
अब्दुर्रहीम नश्तर
फिर इक नए सफ़र पे चला हूँ मकान से
अब्दुर्रहीम नश्तर
पंछियों के रू-ब-रू क्या ज़िक्र-ए-नादारी करूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
मैं तेरी चाह में झूटा हवस में सच्चा हूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
इन काली सड़कों प अक्सर ध्यान आया
अब्दुर्रहीम नश्तर
दश्त-ए-अफ़्कार में सूखे हुए फूलों से मिले
अब्दुर्रहीम नश्तर
चट्टान के साए में खड़ा सोच रहा हूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
अगर हो ख़ौफ़-ज़दा ताक़त-ए-बयाँ कैसी
अब्दुर्रहीम नश्तर
पड़े हैं मस्त भी साक़ी अयाग़ के नज़दीक
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
पाबंद हर जफ़ा पे तुम्हारी वफ़ा के हैं
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी