Ghazal Poetry (page 896)
न पहुँचे छूट कर कुंज-ए-क़फ़स से हम नशेमन तक
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
मिज़्गाँ ने रोका आँखों में दम इंतिज़ार से
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
क्या कीजिए रक़म सनद-ए-एहतिशाम-ए-ज़ुल्फ़
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
रूठे हैं हम से दोस्त हमारे कहाँ कहाँ
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
लग़्ज़िश-ए-साक़ी-ए-मय-ख़ाना ख़ुदा ख़ैर करे
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
का'बा है कभी तो कभी बुत-ख़ाना बना है
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
दिल दिया वहशत लिया और ख़ुद को रुस्वा कर लिया
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
बुत यहाँ मिलते नहीं हैं या ख़ुदा मिलता नहीं
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
अच्छा है कोई तीर-बा-नश्तर भी ले चलो
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
वो शख़्स क्या है मिरे वास्ते सुनाएँ उसे
अब्दुल्लाह कमाल
वादा-ए-वस्ल है लज़्ज़त-ए-इंतिज़ार उठा
अब्दुल्लाह कमाल
उस की जाम-ए-जम आँखें शीशा-ए-बदन मेरा
अब्दुल्लाह कमाल
क़दम क़दम पे नया इम्तिहाँ है मेरे लिए
अब्दुल्लाह कमाल
इतना यक़ीन रख कि गुमाँ बाक़ी रहे
अब्दुल्लाह कमाल
हसीन ख़्वाब न दे अब यक़ीन-ए-सादा दे
अब्दुल्लाह कमाल
बड़ा मुख़्लिस हूँ पाबंद-ए-वफ़ा हूँ
अब्दुल्लाह कमाल
अपने होने का इक इक पल तजरबा करते रहे
अब्दुल्लाह कमाल
अना रही न मिरी मुतलक़-उल-इनानी की
अब्दुल्लाह कमाल
अभी गुनाह का मौसम है आ शबाब में आ
अब्दुल्लाह कमाल
याद यूँ होश गँवा बैठी है
अब्दुल्लाह जावेद
समुंदर पार आ बैठे मगर क्या
अब्दुल्लाह जावेद
रूह को क़ालिब के अंदर जानना मुश्किल हुआ
अब्दुल्लाह जावेद
फूल के लायक़ फ़ज़ा रखनी ही थी
अब्दुल्लाह जावेद
नंगे पाँव की आहट थी या नर्म हवा का झोंका था
अब्दुल्लाह जावेद
मैं तेरी ही आवाज़ हूँ और गूँज रहा हूँ
अब्दुल्लाह जावेद
लगे है आसमाँ जैसा नहीं है
अब्दुल्लाह जावेद
कोई रिश्ता न हो फिर भी रिश्ते बहुत
अब्दुल्लाह जावेद
कभी प्यारा कोई मंज़र लगेगा
अब्दुल्लाह जावेद
जो गुज़रता है गुज़र जाए जी
अब्दुल्लाह जावेद
जानिब-ए-दर देखना अच्छा नहीं
अब्दुल्लाह जावेद