Ghazal Poetry (page 892)
फ़िक्र का गर सिलसिला मौजूद है
अबरार आबिद
वहीं से हद मिली है जा पहुँचता कू-ए-जानाँ तक
अब्र अहसनी गनौरी
हैराँ नहीं हैं हम कि परेशाँ नहीं हैं हम
अब्र अहसनी गनौरी
बेकसी का हाल मय्यत से अयाँ हो जाएगा
अब्र अहसनी गनौरी
तेरी दुनिया की कज-अदाई से
आबिद वदूद
फटा हुआ जो गरेबाँ दिखाई देता है
आबिद वदूद
न घर सुकून-कदा है न कारख़ाना-ए-इश्क़
आबिद वदूद
जब से दरिया में है तुग़्यानी बहुत
आबिद वदूद
जाने किस सम्त को भटका साया
आबिद वदूद
हाथ में माहताब हो जैसे
आबिद वदूद
अपने अंदर भी हम-नवाई नहीं
आबिद वदूद
कहीं से बास नए मौसमों की लाती हुई
आबिद सयाल
कहीं से बास नए मौसमों की लाती हुई
आबिद सयाल
कफ़-ए-ख़िज़ाँ पे खिला मैं इस ए'तिबार के साथ
आबिद सयाल
चाँदनी रात है उदासी है
आबिद सिद्दीक़
न जाने रब्त-ए-मसर्रत है किस क़दर ग़म से
आबिद नामी
आप करिश्मा-साज़ हुए हैं होश में है दीवाना भी
आबिद नामी
ज़िंदगी भर जिन्हों ने देखे ख़्वाब
आबिद मुनावरी
सिर्फ़ कर्ब-ए-अना दिया है मुझे
आबिद मुनावरी
मुक़द्दर में साहिल कहाँ है मियाँ
आबिद मुनावरी
लाला-ज़ारों में ज़र्द फूल हूँ मैं
आबिद मुनावरी
क्यूँ न अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे इतराती हवा
आबिद मुनावरी
ख़ुद सवाल आप ही जवाब हूँ मैं
आबिद मुनावरी
जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए
आबिद मुनावरी
चाँद से अपनी यारी थी
आबिद मुनावरी
बे-तमन्ना हूँ ख़स्ता-जान हूँ मैं
आबिद मुनावरी
और किस का घर कुशादा है कहाँ ठहरेगी रात
आबिद मुनावरी
अगले पड़ाव पर यूँही ख़ेमा लगाओगे
आबिद मुनावरी
ये कार-ए-ख़ैर है इस को न कार-ए-बद समझो
आबिद मलिक
शहर से जब भी कोई शहर जुदा होता है
आबिद मलिक