Ghazal Poetry (page 890)

दुश्मन-ए-जाँ है तिश्ना-ए-ख़ूँ है

आबरू शाह मुबारक

दिल्ली के बीच हाए अकेले मरेंगे हम

आबरू शाह मुबारक

दिल नीं पकड़ी है यार की सूरत

आबरू शाह मुबारक

दिल है तिरे प्यार करने कूँ

आबरू शाह मुबारक

देखो तो जान तुम कूँ मनाते हैं कब सेती

आबरू शाह मुबारक

देख तू बे-रहम आशिक़ नीं तुझे छोड़ा नहीं

आबरू शाह मुबारक

चंचलाहट में तू ममोला है

आबरू शाह मुबारक

बहार आई गली की तरह दिल खोल

आबरू शाह मुबारक

बढ़े है दिन-ब-दिन तुझ मुख की ताब आहिस्ता आहिस्ता

आबरू शाह मुबारक

और वाइज़ के साथ मिल ले शैख़

आबरू शाह मुबारक

अगर दिल इश्क़ सीं ग़ाफ़िल रहा है

आबरू शाह मुबारक

अगर अँखियों सीं अँखियों को मिलाओगे तो क्या होगा

आबरू शाह मुबारक

आया है सुब्ह नींद सूँ उठ रसमसा हुआ

आबरू शाह मुबारक

आश्नाई ब-ज़ोर नहिं होती

आबरू शाह मुबारक

आशिक़ बिपत के मारे रोते हुए जिधर जाँ

आबरू शाह मुबारक

आज यारों को मुबारक हो कि सुब्ह-ए-ईद है

आबरू शाह मुबारक

न पूछो जान पर क्या कुछ गुज़रती है ग़म-ए-दिल से

अबरार शाहजहाँपुरी

कुछ है ख़बर फ़रिश्तों के जलते हैं पर कहाँ

अबरार शाहजहाँपुरी

इलाही क्या कभी पूरे ये अरमाँ हो भी सकते हैं

अबरार शाहजहाँपुरी

वसवसे दिल में न रख ख़ौफ़-ए-रसन ले के न चल

अबरार किरतपुरी

नुमायाँ जब वो अपने ज़ेहन की तस्वीर करता है

अबरार किरतपुरी

नई हवा में कोई रंग-ए-काएनात में गुम

अबरार किरतपुरी

बाग़बाँ जश्न-ए-बहाराँ नहीं होने देते

अबरार किरतपुरी

शाम से मिलने गया तो रात ने ठहरा लिया

अबरार हामिद

क्या क्या धरे अजूबे हैं शहर-ए-ख़याल में

अबरार हामिद

ख़ुशी के वक़्त भी तुझ को मलाल कैसा है

अबरार हामिद

ख़ुश-बख़्त हैं आज़ाद हैं जो अपने सुख़न में

अबरार हामिद

दिए की लौ से न जल जाए तीरगी शब की

अबरार हामिद

बिफरी लहरें रात अँधेरी और बला की आँधी है

अबरार हामिद

भड़क उठा है अलाव तुम्हारी फ़ुर्क़त का

अबरार हामिद