Ghazal Poetry (page 901)
हर मसर्रत से किनारा कर लिया
अब्दुल मलिक सोज़
दिल ग़म-ए-इश्क़ के इज़हार से कतराता है
अब्दुल मलिक सोज़
दिल अपना याद-ए-यार से बेगाना तो नहीं
अब्दुल मलिक सोज़
आज क्यूँ चुप हैं तेरे सौदाई
अब्दुल मलिक सोज़
वो है हैरत-फ़ज़ा-ए-चश्म-ए-मा'नी सब नज़ारों में
अब्दुल मजीद सालिक
न मोहतसिब की न हूर-ओ-जिनाँ की बात करो
अब्दुल मजीद सालिक
मिरे दिल में है कि पूछूँ कभी मुर्शिद-ए-मुग़ाँ से
अब्दुल मजीद सालिक
ख़िरद में मुब्तिला है 'सालिक' दीवाना बरसों से
अब्दुल मजीद सालिक
जो मुश्त-ए-ख़ाक हो उस ख़ाक-दाँ की बात करो
अब्दुल मजीद सालिक
हम-नफ़सो उजड़ गईं मेहर-ओ-वफ़ा की बस्तियाँ
अब्दुल मजीद सालिक
ग़म के हाथों मिरे दिल पर जो समाँ गुज़रा है
अब्दुल मजीद सालिक
चराग़-ए-ज़िंदगी होगा फ़रोज़ाँ हम नहीं होंगे
अब्दुल मजीद सालिक
ज़िंदगी छोटी है सामान बहुत
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
कहाँ शिकवा ज़माने का पस-ए-दीवार करते हैं
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
जब कोई मेहरबान होता है
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
जाना कहाँ है और कहाँ जा रहे हैं हम
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
बेवफ़ा कहिए बा-वफ़ा कहिए
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
अब चराग़ों में ज़िंदगी कम है
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
मुद्दतों देख लिया चुप रह के
अब्दुल मजीद हैरत
मरहम-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर हो जाए
अब्दुल मजीद हैरत
मरहम ज़ख़्म-ए-जिगर हो जाए
अब्दुल मजीद हैरत
ईमाँ-नवाज़ गर्दिश-ए-पैमाना हो गई
अब्दुल मजीद हैरत
ईमाँ-नवाज़ गर्दिश-ए-पैमाना हो गई
अब्दुल मजीद हैरत
शाम-ए-ग़म और सितारों के सिवा
अब्दुल मजीद भट्टी
ज़ुल्फ़-ए-बरहम सँभाल कर चलिए
अब्दुल हमीद अदम
ज़ख़्म दिल के अगर सिए होते
अब्दुल हमीद अदम
ज़बाँ पर आप का नाम आ रहा था
अब्दुल हमीद अदम
ये कैसी सरगोशी-ए-अज़ल साज़-ए-दिल के पर्दे हिला रही है
अब्दुल हमीद अदम
वो सूरज इतना नज़दीक आ रहा है
अब्दुल हमीद अदम
वो जो तेरे फ़क़ीर होते हैं
अब्दुल हमीद अदम