Ghazal Poetry (page 905)
क्या सहल समझे हो कहीं धब्बा छुटा न हो
अब्दुल हलीम शरर
इस तिलिस्म-ए-रोज़-ओ-शब से तो कभी निकलो ज़रा
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
होंकते दश्त में इक ग़म का समुंदर देखो
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
हर इंसाँ अपने होने की सज़ा है
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
ग़ुबार-ए-दर्द से सारा बदन अटा निकला
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
गर्द-ए-फ़िराक़ ग़ाज़ा कश-ए-आइना न हो
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
दुआ को हाथ मिरा जब कभी उठा होगा
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
बहार बन के ख़िज़ाँ को न यूँ दिलासा दे
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
फिर रग-शो'ला-ए-जाँ-सोज़ में नश्तर गुज़रा
अब्दुल हादी वफ़ा
ज़ाहिरन मौत है क़ज़ा है इश्क़
अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
पीरी में शौक़ हौसला-फ़रसा नहीं रहा
अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
नक़्श-ए-दिल है सितम जुदाई का
अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
ज़मीं-नज़ाद हैं लेकिन ज़माँ में रहते हैं
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
ताकीद करो ज़मज़मा-संजान-ए-चमन को
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
क़ुर्ब नस नस में आग भरता है
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
क़ज़ा से क़र्ज़ किस मुश्किल से ली उम्र-ए-बक़ा हम ने
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
फूली है शफ़क़ गो कि अभी शाम नहीं है
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
नख़चीर हूँ मैं कश्मकश-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र का
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
मैं बात कौन से पैरा-ए-बयाँ में करूँ
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
हों क्यूँ न मुन्कशिफ़ असरार पस्त-ओ-बाला के
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
भूलों उन्हें कैसे कैसे कैसे
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
क्या कहीं मिलता है क्या ख़्वाबों में
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
ख़ामोश कली सारे गुलिस्ताँ की ज़बाँ है
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
ग़ुंचे का जवाब हो गया है
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
अपनी नाकाम तमन्नाओं का मातम न करो
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
उस से उम्मीद-ए-वफ़ा ऐ दिल-ए-नाशाद न कर
अब्दुल अलीम आसि
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-दिलबरी सिमट आ निगाह-ए-मजाज़ में
अब्दुल अलीम आसि
जबीन-ए-शौक़ को कुछ और भी इज़्न-ए-सआदत दे
अब्दुल अलीम आसि
अपनी हस्ती से था ख़ुद मैं बद-गुमाँ कल रात को
अब्दुल अलीम आसि
ज़िक्र हम से बे-तलब का क्या तलबगारी के दिन
अब्दुल अहद साज़