Ghazal Poetry (page 907)
जाने क़लम की आँख में किस का ज़ुहूर था
अब्दुल अहद साज़
हम अपने ज़ख़्म कुरेदते हैं वो ज़ख़्म पराए धोते थे
अब्दुल अहद साज़
हिसार-ए-दीद में जागा तिलिस्म-ए-बीनाई
अब्दुल अहद साज़
हसरत-ए-दीद नहीं ज़ौक़-ए-तमाशा भी नहीं
अब्दुल अहद साज़
हर इक लम्हे की रग में दर्द का रिश्ता धड़कता है
अब्दुल अहद साज़
हर इक धड़कन अजब आहट
अब्दुल अहद साज़
हद-ए-उफ़ुक़ पर सारा कुछ वीरान उभरता आता है
अब्दुल अहद साज़
घुल सी गई रूह में उदासी
अब्दुल अहद साज़
इक ईमा इक इशारा मर रहा है
अब्दुल अहद साज़
दूर से शहर-ए-फ़िक्र सुहाना लगता है
अब्दुल अहद साज़
दिखाई देने के और दिखाई न देने के दरमियान सा कुछ
अब्दुल अहद साज़
दरख़्त रूह के झूमे परिंद गाने लगे
अब्दुल अहद साज़
बुझ गई आग तो कमरे में धुआँ ही रखना
अब्दुल अहद साज़
बे-मसरफ़ बे-हासिल दुख
अब्दुल अहद साज़
बंद फ़सीलें शहर की तोड़ें ज़ात की गिरहें खोलें
अब्दुल अहद साज़
बजा कि पाबंद-ए-कूचा-ए-नाज़ हम हुए थे
अब्दुल अहद साज़
बजा कि पाबंद-ए-कूचा-ए-नाज़ हम हुए थे
अब्दुल अहद साज़
बजा कि लुत्फ़ है दुनिया में शोर करने का
अब्दुल अहद साज़
बहुत मलूल बड़े शादमाँ गए हुए हैं
अब्दुल अहद साज़
बद-सोहबतों को छोड़ शरीफ़ों के साथ घूम
अब्दुल अहद साज़
बातिन से सदफ़ के दुर-ए-नायाब खुलेंगे
अब्दुल अहद साज़
अज़दवाजी ज़िंदगी भी और तिजारत भी अदब भी
अब्दुल अहद साज़
अबस है राज़ को पाने की जुस्तुजू क्या है
अब्दुल अहद साज़
आज फिर शब का हवाला तिरी जानिब ठहरे
अब्दुल अहद साज़
यूँ तो शीराज़ा-ए-जाँ कर के बहम उठते हैं
अब्बास ताबिश
ये वाहिमे भी अजब बाम-ओ-दर बनाते हैं
अब्बास ताबिश
ये तो नहीं फ़रहाद से यारी नहीं रखते
अब्बास ताबिश
ये किस के ख़ौफ़ का गलियों में ज़हर फैल गया
अब्बास ताबिश
ये हम को कौन सी दुनिया की धुन आवारा रखती है
अब्बास ताबिश
ये हम जो हिज्र में उस का ख़याल बाँधते हैं
अब्बास ताबिश