Ghazal Poetry (page 909)
निगाह-ए-अव्वलीं का है तक़ाज़ा देखते रहना
अब्बास ताबिश
नक़्श सारे ख़ाक के हैं सब हुनर मिट्टी का है
अब्बास ताबिश
न तुझ से है न गिला आसमान से होगा
अब्बास ताबिश
मुसाफ़िरत में शब-ए-वग़ा तक पहुँच गए हैं
अब्बास ताबिश
मुझ तही-जाँ से तुझे इंकार पहले तो न था
अब्बास ताबिश
मेरी तन्हाई बढ़ाते हैं चले जाते हैं
अब्बास ताबिश
मिरे बदन में लहू का कटाव ऐसा था
अब्बास ताबिश
मेरे आ'साब मोअ'त्तल नहीं होने देंगे
अब्बास ताबिश
मकाँ-भर हम को वीरानी बहुत है
अब्बास ताबिश
मैं अपने इश्क़ को ख़ुश-एहतिमाम करता हुआ
अब्बास ताबिश
मह-रुख़ जो घरों से कभी बाहर निकल आए
अब्बास ताबिश
कुंज-ए-ग़ज़ल न क़ैस का वीराना चाहिए
अब्बास ताबिश
कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है
अब्बास ताबिश
कोई मिलता नहीं ये बोझ उठाने के लिए
अब्बास ताबिश
खा के सूखी रोटियाँ पानी के साथ
अब्बास ताबिश
कस कर बाँधी गई रगों में दिल की गिरह तो ढीली है
अब्बास ताबिश
जो भी मिन-जुम्ला-ए-अश्जार नहीं हो सकता
अब्बास ताबिश
झिलमिल से क्या रब्त निकालें कश्ती की तक़दीरों का
अब्बास ताबिश
जहान-ए-मर्ग-ए-सदा में इक और सिलसिला ख़त्म हो गया है
अब्बास ताबिश
इतना आसाँ नहीं मसनद पे बिठाया गया मैं
अब्बास ताबिश
इश्क़ की जोत जगाने में बड़ी देर लगी
अब्बास ताबिश
हम ने चुप रह के जो एक साथ बिताया हुआ है
अब्बास ताबिश
हवा-ए-तेज़ तिरा एक काम आख़िरी है
अब्बास ताबिश
हवा-ए-मौसम-ए-गुल से लहू लहू तुम थे
अब्बास ताबिश
हर-चंद तिरी याद जुनूँ-ख़ेज़ बहुत है
अब्बास ताबिश
हँसने नहीं देता कभी रोने नहीं देता
अब्बास ताबिश
फ़क़त माल-ओ-ज़र-ए-दीवार-ओ-दर अच्छा नहीं लगता
अब्बास ताबिश
एक क़दम तेग़ पे और एक शरर पर रक्खा
अब्बास ताबिश
एक मुश्किल सी बहर-तौर बनी होती है
अब्बास ताबिश
डूब कर भी न पड़ा फ़र्क़ गिराँ-जानी में
अब्बास ताबिश