Ghazal Poetry (page 910)

दिल दुखों के हिसार में आया

अब्बास ताबिश

दी है वहशत तो ये वहशत ही मुसलसल हो जाए

अब्बास ताबिश

दश्त-ए-हैरत में सबील-ए-तिश्नगी बन जाइए

अब्बास ताबिश

दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं

अब्बास ताबिश

दर-ए-उफ़ुक़ पे रक़म रौशनी का बाब करें

अब्बास ताबिश

दम-ए-सुख़न ही तबीअ'त लहू लहू की जाए

अब्बास ताबिश

दहन खोलेंगी अपनी सीपियाँ आहिस्ता आहिस्ता

अब्बास ताबिश

चश्म-ए-नम-दीदा सही ख़ित्ता-ए-शादाब मिरा

अब्बास ताबिश

चराग़-ए-सुब्ह जला कोई ना-शनासी में

अब्बास ताबिश

चाँद को तालाब मुझ को ख़्वाब वापस कर दिया

अब्बास ताबिश

चाँद का पत्थर बाँध के तन से उतरी मंज़र-ए-ख़्वाब में चुप

अब्बास ताबिश

बयाँ अपनी हक़ीक़त कर रहा हूँ

अब्बास ताबिश

बैठता उठता था मैं यारों के बीच

अब्बास ताबिश

बहुत बे-कार मौसम है मगर कुछ काम करना है

अब्बास ताबिश

बदन के चाक पर ज़र्फ़-ए-नुमू तय्यार करता हूँ

अब्बास ताबिश

बचपन का दौर अहद-ए-जवानी में खो गया

अब्बास ताबिश

अजीब तौर की है अब के सरगिरानी मिरी

अब्बास ताबिश

अजब सौदा-ए-वहशत है दिल-ए-ख़ुद-सर में रहता है

अब्बास ताबिश

ऐसे तो कोई तर्क सुकूनत नहीं करता

अब्बास ताबिश

अब परिंदों की यहाँ नक़्ल-ए-मकानी कम है

अब्बास ताबिश

अब मोहब्बत न फ़साना न फ़ुसूँ है यूँ है

अब्बास ताबिश

अब अधूरे इश्क़ की तकमील ही मुमकिन नहीं

अब्बास ताबिश

आँख पे पट्टी बाँध के मुझ को तन्हा छोड़ दिया है

अब्बास ताबिश

ताबीर को तरसे हुए ख़्वाबों की ज़बाँ हैं

अब्बास रिज़वी

सितारे चाहते हैं माहताब माँगते हैं

अब्बास रिज़वी

मैं उस से दूर रहा उस की दस्तरस में रहा

अब्बास रिज़वी

जिस को हम समझते थे उम्र भर का रिश्ता है

अब्बास रिज़वी

जब कोई तीर हवादिस की कमाँ से आया

अब्बास रिज़वी

हम तिरे हुस्न-ए-जहाँ-ताब से डर जाते हैं

अब्बास रिज़वी

हर तरफ़ शोर-ए-फ़ुग़ाँ है कोई सुनता ही नहीं

अब्बास रिज़वी