Ghazal Poetry (page 911)
गुज़र गया वो ज़माना वो ज़ख़्म भर भी गए
अब्बास रिज़वी
धुआँ सा फैल गया दिल में शाम ढलते ही
अब्बास रिज़वी
अहल-ए-जुनूँ थे फ़स्ल-ए-बहाराँ के सर गए
अब्बास रिज़वी
लम्हा-दर-लम्हा तिरी राह तका करती है
अब्बास क़मर
जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे
अब्बास क़मर
हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं
अब्बास क़मर
हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है
अब्बास क़मर
अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए
अब्बास क़मर
फिर वही अंदोह-ए-जाँ है और मैं
अब्बास कैफ़ी
ज़र्फ़ से बढ़ के हो इतना नहीं माँगा जाता
अब्बास दाना
ये बात सच है कि तेरा मकान ऊँचा है
अब्बास दाना
वही दर्द है वही बेबसी तिरे गाँव में मिरे शहर में
अब्बास दाना
वफ़ादारी पे दे दी जान ग़द्दारी नहीं आई
अब्बास दाना
उस की वफ़ा न मेरी वफ़ा का सवाल था
अब्बास दाना
नाम ख़ुश्बू था सरापा भी ग़ज़ल जैसा था
अब्बास दाना
न हो जिस पे भरोसा उस से हम यारी नहीं रखते
अब्बास दाना
मिरा ख़ुलूस अभी सख़्त इम्तिहान में है
अब्बास दाना
मौत ने मुस्कुरा के पूछा है
अब्बास दाना
कोई सुबूत-ए-जुर्म जगह पर नहीं मिला
अब्बास दाना
जो हैं मज़लूम उन को तो तड़पता छोड़ देते हैं
अब्बास दाना
गर्दिश-ए-दौराँ से इक लम्हा चुराने लिए
अब्बास दाना
दिल लगाया है तो नफ़रत भी नहीं कर सकते
अब्बास दाना
बेवफ़ाई उस ने की मेरी वफ़ा अपनी जगह
अब्बास दाना
अक़्ल-ओ-दानिश को ज़माने से छुपा रक्खा है
अब्बास दाना
अपने ही ख़ून से इस तरह अदावत मत कर
अब्बास दाना
ये तुम से किस ने कहा है कि दास्ताँ न कहो
अब्बास अलवी
जो सारे हम-सफ़र इक बार हिर्ज़-ए-जाँ कर लें
अब्बास अलवी
चश्म-ए-ज़ाहिर-बीं को हर इक पेश-मंज़र आश्ना
अब्बास अलवी
नज़्अ' की सख़्ती बढ़ी उन को पशेमाँ देख कर
अब्बास अली ख़ान बेखुद
किसी से इश्क़ करना और इस को बा-ख़बर करना
अब्बास अली ख़ान बेखुद