Friendship Poetry (page 57)

ग़मगीं नहीं हूँ दहर में तो शाद भी नहीं

बहराम जी

दूर हो दर्द-ए-दिल ये और दर्द-ए-जिगर किसी तरह

बहराम जी

दुनिया में इबादत को तिरी आए हुए हैं

बहराम जी

बहस क्यूँ है काफ़िर-ओ-दीं-दार की

बहराम जी

यार था गुलज़ार था बाद-ए-सबा थी मैं न था

ज़फ़र

कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए

ज़फ़र

फ़रहाद ओ क़ैस ओ वामिक़ ओ अज़रा थे चार दोस्त

ज़फ़र

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले

ज़फ़र

वाक़िफ़ हैं हम कि हज़रत-ए-ग़म ऐसे शख़्स हैं

ज़फ़र

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ज़फ़र

शाने की हर ज़बाँ से सुने कोई लाफ़-ए-ज़ुल्फ़

ज़फ़र

रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा

ज़फ़र

पान की सुर्ख़ी नहीं लब पर बुत-ए-ख़ूँ-ख़्वार के

ज़फ़र

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

ज़फ़र

न उस का भेद यारी से न अय्यारी से हाथ आया

ज़फ़र

मैं हूँ आसी कि पुर-ख़ता कुछ हूँ

ज़फ़र

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में

ज़फ़र

क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँकर हुआ

ज़फ़र

जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो

ज़फ़र

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल

ज़फ़र

हम ने तिरी ख़ातिर से दिल-ए-ज़ार भी छोड़ा

ज़फ़र

होते होते चश्म से आज अश्क-बारी रह गई

ज़फ़र

हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में

ज़फ़र

हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए

ज़फ़र

भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

ज़फ़र

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी

ज़फ़र

क़दमों से इतना दूर किनारा कभी न था

बद्र-ए-आलम ख़लिश

इक़रार किसी दिन है तो इंकार किसी दिन

बद्र वास्ती