Friendship Poetry (page 58)

फ़िक्र-ए-अहल-ए-हुनर पे बैठी है

बद्र वास्ती

कब बयाबाँ राह में आया ये समझा ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

जले हैं दिल न चराग़ों ने रौशनी की है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

मान लो साहिबो कहा मेरा

बाबर रहमान शाह

कैफ़ियत-ए-दिल-ए-हज़ीं हम से नहीं बयाँ हुई

बीएस जैन जौहर

हक़ीक़तें तो मिरे रोज़ ओ शब की साथी हैं

अज़रा नक़वी

किसी ख़याल की हिद्दत से जलना चाहती हूँ

अज़रा नक़वी

वतन

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

गरचे कुछ रंग उस का काला है

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

शब की आग़ोश में महताब उतारा उस ने

अज़्म शाकरी

मुझ से ये पूछ रहे हैं मिरे अहबाब 'अज़ीज़'

अज़ीज़ वारसी

सोज़िश-ए-ग़म के सिवा काहिश-ए-फ़ुर्क़त के सिवा

अज़ीज़ वारसी

चाँदनी रात में

अज़ीज़ तमन्नाई

नाला-ए-बे-आसमाँ

अज़ीज़ क़ैसी

आईने से

अज़ीज़ क़ैसी

उलझाओ का मज़ा भी तिरी बात ही में था

अज़ीज़ क़ैसी

सर-ए-सहरा-ए-जाँ हम चाक-दामानी भी करते हैं

अज़ीज़ नबील

ख़ाक चेहरे पे मल रहा हूँ मैं

अज़ीज़ नबील

धूप के जाते ही मर जाऊँगा मैं

अज़ीज़ नबील

आँखों के ग़म-कदों में उजाले हुए तो हैं

अज़ीज़ नबील

'मीर'

अज़ीज़ लखनवी

आतिश-ए-ख़ामोश

अज़ीज़ लखनवी

तिरी कोशिश हम ऐ दिल सई-ए-ला-हासिल समझते हैं

अज़ीज़ लखनवी

मेरे रोने पे ये हँसी कैसी

अज़ीज़ लखनवी

एक ही ख़त में है क्या हाल जो मज़कूर नहीं

अज़ीज़ लखनवी

दिल कुश्ता-ए-नज़र है महरूम-ए-गुफ़्तुगू हूँ

अज़ीज़ लखनवी

ग़म-ए-हयात ओ ग़म-ए-दोस्त की कशाकश में

अज़ीज़ हामिद मदनी

ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब

अज़ीज़ हामिद मदनी

ये फ़ज़ा-ए-साज़-ओ-मुज़रिब ये हुजूम-ताज-ए-दाराँ

अज़ीज़ हामिद मदनी

सँभल न पाए तो तक़्सीर-ए-वाक़ई भी नहीं

अज़ीज़ हामिद मदनी