Friendship Poetry (page 60)

रस्म-ए-अंदेशा से फ़ारिग़ हुए हम

आज़र तमन्ना

फिर इस के बा'द का कोई न हो गुज़र मुझ में

आज़ाद गुलाटी

सितम-दोस्त फ़िक्र-ए-अदावत कहाँ तक

आज़ाद अंसारी

न पूछो कौन हैं क्यूँ राह में नाचार बैठे हैं

आज़ाद अंसारी

डराने वाला सुन कर डर रहा है

आयुष चराग़

इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के

अय्यूब ख़ावर

बुझने लगे नज़र तो फिर उस पार देखना

अय्यूब ख़ावर

बर्ग-ए-गुल शाख़-ए-हिज्र का कर दे

अय्यूब ख़ावर

उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की

औरंगज़ेब

अब कोई और मुसीबत तो न पाली जाए

औरंगज़ेब

आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है

औरंगज़ेब

आइने से गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

कीसा-ए-दरवेश में जो भी है ज़र उतना ही है

अतीक़ुल्लाह

ये तिरी ज़ुल्फ़ का कुंडल तो मुझे मार चला

अतहर शाह ख़ान जैदी

मुसव्विर का हाथ

अतहर राज़

फूलों से बहारों में जुदा थे तो हमीं थे

अतहर राज़

जीना है तो जीने का सहारा भी तो होगा

अतहर राज़

ग़म के बादल दिल-ए-नाशाद पे ऐसे छाए

अतहर राज़

मैं पूछ लेता हूँ यारों से रत-जगों का सबब

अतहर नासिक

यही बहुत है कि अहबाब पूछ लेते हैं

अतहर नासिक

मैं तुझे भूलना चाहूँ भी तो ना-मुम्किन है

अतहर नासिक

बहुत छोटे हैं मुझ से मेरे दुश्मन

अतहर नफ़ीस

सुकूत-ए-शब से इक नग़्मा सुना है

अतहर नफ़ीस

न मंज़िल हूँ न मंज़िल-आश्ना हूँ

अतहर नफ़ीस

लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ

अतहर नफ़ीस

कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा

अतहर नफ़ीस

करता मैं अब किसी से कोई इल्तिमास क्या

अतहर नादिर

जिस को देखो वो गिरफ़्तार-ए-बला लगता है

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

आसमाँ गर्दिश में था सारी ज़मीं चक्कर में थी

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

फूल पर ओस है आरिज़ पे नमी हो जैसे

अतीक़ अंज़र