Friendship Poetry (page 85)
शुऊर में कभी एहसास में बसाऊँ उसे
अहमद नदीम क़ासमी
साँस लेना भी सज़ा लगता है
अहमद नदीम क़ासमी
जब भी आँखों में तिरी रुख़्सत का मंज़र आ गया
अहमद नदीम क़ासमी
हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते
अहमद नदीम क़ासमी
इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़-ओ-समा दे दूँगा
अहमद नदीम क़ासमी
बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था
अहमद नदीम क़ासमी
अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या
अहमद नदीम क़ासमी
अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था
अहमद नदीम क़ासमी
यार सब जम्अ हुए रात की ख़ामोशी में
अहमद मुश्ताक़
टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया
अहमद मुश्ताक़
सफ़र नया था न कोई नया मुसाफ़िर था
अहमद मुश्ताक़
ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं
अहमद मुश्ताक़
चाँद इस घर के दरीचों के बराबर आया
अहमद मुश्ताक़
चमक-दमक पे न जाओ खरी नहीं कोई शय
अहमद मुश्ताक़
अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए
अहमद मुश्ताक़
अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए
अहमद मुश्ताक़
ऐ तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक
अहमद ख़याल
चाहिए है मुझे इंकार-ए-मोहब्बत मिरे दोस्त
अहमद कामरान
ज़िंदा रहने का तक़ाज़ा नहीं छोड़ा जाता
अहमद कामरान
ये जो बेदार दिखाई दिया हूँ
अहमद कामरान
तुम्हारे हिज्र को काफ़ी नहीं समझता मैं
अहमद कामरान
तू ज़ियादा में से बाहर नहीं आया करता
अहमद कामरान
तेरे हिस्से के भी सदमात उठा लेता हूँ
अहमद कामरान
मिट्टी से बग़ावत न बग़ावत से गुरेज़ाँ
अहमद कामरान
कोई मंसब कोई दस्तार नहीं चाहिए है
अहमद कामरान
ख़्वाब यूँ ही नहीं होते पूरे
अहमद कामरान
मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब
अहमद कमाल परवाज़ी
फूल पर ओस का क़तरा भी ग़लत लगता है
अहमद कमाल परवाज़ी
आँखों की तज्दीदा
अहमद जावेद
उस के लहजे का वो उतार चढ़ाओ
अहमद जावेद