Friendship Poetry (page 87)
अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर
अहमद फ़राज़
तख़्लीक़
अहमद फ़राज़
नामा-ए-जानाँ
अहमद फ़राज़
मुहासरा
अहमद फ़राज़
मयूरका
अहमद फ़राज़
मैं और तू
अहमद फ़राज़
ख़्वाबों के ब्योपारी
अहमद फ़राज़
कर गए कूच कहाँ
अहमद फ़राज़
काली दीवार
अहमद फ़राज़
इंतिसाब
अहमद फ़राज़
दोस्ती का हाथ
अहमद फ़राज़
भली सी एक शक्ल थी
अहमद फ़राज़
ऐ मेरे वतन के ख़ुश-नवाओ
अहमद फ़राज़
ऐ मेरे सारे लोगो
अहमद फ़राज़
अभी हम ख़ूबसूरत हैं
अहमद फ़राज़
यूँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ
अहमद फ़राज़
यूँ तो पहले भी हुए उस से कई बार जुदा
अहमद फ़राज़
ये तबीअत है तो ख़ुद आज़ार बन जाएँगे हम
अहमद फ़राज़
ये शहर सेहर-ज़दा है सदा किसी की नहीं
अहमद फ़राज़
ये बे-दिली है तो कश्ती से यार क्या उतरें
अहमद फ़राज़
ये आलम शौक़ का देखा न जाए
अहमद फ़राज़
वो दुश्मन-ए-जाँ जान से प्यारा भी कभी था
अहमद फ़राज़
वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ
अहमद फ़राज़
उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
अहमद फ़राज़
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अहमद फ़राज़
उस मंज़र-ए-सादा में कई जाल बंधे थे
अहमद फ़राज़
तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त
अहमद फ़राज़
तेरी बातें ही सुनाने आए
अहमद फ़राज़
तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ
अहमद फ़राज़
तिरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था वही तेरी जल्वागरी रही
अहमद फ़राज़