Heart Broken Poetry (page 131)

अगर मैं चीख़ूँ

फ़रहत एहसास

आग़ाज़ की तारीख़

फ़रहत एहसास

ज़मीं से अर्श तलक सिलसिला हमारा भी था

फ़रहत एहसास

ये बाग़ ज़िंदा रहे ये बहार ज़िंदा रहे

फ़रहत एहसास

यही हिसाब-ए-मोहब्बत दोबारा कर के लाओ

फ़रहत एहसास

वो मेरी जाँ के सदफ़ में गुहर सा रहता है

फ़रहत एहसास

वस्ल की रात में हम रात में बह जाते हैं

फ़रहत एहसास

उस तरफ़ तू तिरी यकताई है

फ़रहत एहसास

उधर वो दश्त-ए-मुसलसल इधर मुसलसल मैं

फ़रहत एहसास

तू मुझ को जो इस शहर में लाया नहीं होता

फ़रहत एहसास

ठोकरें खा के सँभलना नहीं आता है मुझे

फ़रहत एहसास

तेरे सूरज को तिरी शाम से पहचानते हैं

फ़रहत एहसास

तेरा भला हो तू जो समझता है मुझ को ग़ैर

फ़रहत एहसास

तन्हाई के आब-ए-रवाँ के साहिल पर बैठा हूँ मैं

फ़रहत एहसास

सूने सियाह शहर पे मंज़र-पज़ीर मैं

फ़रहत एहसास

सहरा के संगीन सफ़र में आब-रसानी कम न पड़े

फ़रहत एहसास

साहिब-ए-इश्क़ अब इतनी सी तो राहत मुझे दे

फ़रहत एहसास

सब ने'मतें हैं शहर में इंसान ही नहीं

फ़रहत एहसास

सब मिरा आब-ए-रवाँ किस के इशारों पे बहा जाता है

फ़रहत एहसास

सब लज़्ज़तें विसाल की बेकार करते हो

फ़रहत एहसास

रौनक़-ए-ज़हर हो चुका मिरा दिल

फ़रहत एहसास

रास्ते हम से राज़ कहने लगे

फ़रहत एहसास

रात बहुत शराब पी रात बहुत पढ़ी नमाज़

फ़रहत एहसास

पुराना ज़ख़्म जिसे तजरबा ज़ियादा है

फ़रहत एहसास

फिर वही मौसम-ए-जुदाई है

फ़रहत एहसास

पैकर-ए-अक़्ल तिरे होश ठिकाने लग जाएँ

फ़रहत एहसास

पहले तो ज़रा सा हट के देखा

फ़रहत एहसास

नंग धड़ंग मलंग तरंग में आएगा जो वही काम करेंगे

फ़रहत एहसास

नहीं देखता दिन जिसे चश्म-ए-शब देखती है

फ़रहत एहसास

मोहब्बत का सिला-कार-ए-मोहब्बत से नहीं मिलता

फ़रहत एहसास