Heart Broken Poetry (page 156)

साए में आबलों की जलन और बढ़ गई

एजाज़ रहमानी

रंग मौसम के साथ लाए हैं

एजाज़ रहमानी

नक़्श-बर-आब हो गया हूँ मैं

एजाज़ रहमानी

मिट गया ग़म तिरे तकल्लुम से

एजाज़ रहमानी

कितने बा-होश हो गए हम लोग

एजाज़ रहमानी

ख़ुश्क दरिया पड़ा है ख़्वाहिश का

एजाज़ रहमानी

हवा के वास्ते इक काम छोड़ आया हूँ

एजाज़ रहमानी

हँसी लबों पे सजाए उदास रहता है

एजाज़ रहमानी

अब कर्ब के तूफ़ाँ से गुज़रना ही पड़ेगा

एजाज़ रहमानी

तब हज़ारों अँधेरों से

एजाज़ रही

सवाल सवाल सियाह कश्कोल

एजाज़ रही

काले मौसमों की आख़िरी रात

एजाज़ रही

तपती ज़मीं पे पाँव न धर अब भी लौट जा

एजाज़ रही

सहर होते ही कोई हो गया रुख़्सत गले मिल कर

एजाज़ उबैद

हथेलियों में लकीरों का जाल था कितना

एजाज़ उबैद

उस ने देखा था अजब एक तमाशा मुझ में

एजाज़ उबैद

था वो जंगल कि नगर याद नहीं

एजाज़ उबैद

तेरे दामन की थी या मस्त हुआ किस की थी

एजाज़ उबैद

नए सफ़र में जो पिछले सफ़र के साथी थे

एजाज़ उबैद

मैं ने क्या काम ला-जवाब किया

एजाज़ उबैद

किस से मिलने जाओ अब किस से मुलाक़ातें करो

एजाज़ उबैद

जो जा चुके हैं ग़ालिबन उतरें कभी ज़ीना तिरा

एजाज़ उबैद

हम ने आँख से देखा कितने सूरज निकले डूब गए

एजाज़ उबैद

हथेलियों में लकीरों का जाल था कितना

एजाज़ उबैद

ग़म भी उतना नहीं कि तुम से कहें

एजाज़ उबैद

गले लग कर मिरे वो जाने हँसता था कि रोता था

एजाज़ उबैद

दूसरों की आँख ले कर भी पशेमानी हुई

एजाज़ उबैद

दिखाता क्या है ये टूटी हुई कमान मुझे

एजाज़ उबैद

ऐसे ही दिन थे कुछ ऐसी शाम थी

एजाज़ उबैद

अभी तमाम आइनों में ज़र्रा ज़र्रा आब है

एजाज़ उबैद