Heart Broken Poetry (page 179)
कब इक मक़ाम पे रुकती है सर-फिरी है हवा
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
जीना है ख़ूब औरों की ख़ातिर जिया करो
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
जाने क्या कुछ है आज होने को
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
हमारी जागती आँखों में ख़्वाब सा क्या था
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
एक आलम है ये हैरानी का जीना कैसा
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
दीवार-ओ-दर में सिमटा इक लम्स काँपता है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
देता था जो साया वो शजर काट रहा है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
बे-तअल्लुक़ सारे रिश्ते कौन किस का आश्ना
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
बदन पे ज़ख़्म सजाए लहू लबादा किया
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
तुम्हारी याद का इक दायरा बनाती हूँ
बिल्क़ीस ख़ान
सौ सदियों का नौहा है
बिल्क़ीस ख़ान
करूँ क्या सख़्त मुश्किल आ पड़ी है
बिल्क़ीस ख़ान
हमारे दिल का न दर खटखटा परेशानी
बिल्क़ीस ख़ान
घर में जब बेटियाँ नहीं होंगी
बिल्क़ीस ख़ान
सुना है मैं ने अज़िय्यत मज़ा भी देती है
बिलाल अहमद
रिस रहा है मुद्दत से कोई पहला ग़म मुझ में
बिलाल अहमद
अजीब क़ैद थी जिस में बहुत ख़ुशी थी मुझे
बिलाल अहमद
तड़ख़न
बिलाल अहमद
सोते में मुस्कुराते बच्चे को देख कर
बिलाल अहमद
नास्टैल्जिया
बिलाल अहमद
मुश्किल
बिलाल अहमद
एक ख़्वाब
बिलाल अहमद
दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989
बिलाल अहमद
धुँद
बिलाल अहमद
ज़मीं नई थी अनासिर की ख़ू बदलती थी
बिलाल अहमद
तिरी तलाश में निकला तो रास्ता हुआ मैं
बिलाल अहमद
शफ़क़ से बाम-ए-फ़लक लाला-गूँ भी होता है
बिलाल अहमद
रिस रहा है मुद्दत से कोई पहला ग़म मुझ में
बिलाल अहमद
इक दिखावा रह गया बस दिल से वो चाहत गई
बिलाल अहमद
जाम-ए-गदाई हाथ में ले नित सांज-सवेरे फिरते हैं
भूरे ख़ान आशुफ़्ता