Heart Broken Poetry (page 180)
न क़रीब आ न तो दूर जा ये जो फ़ासला है ये ठीक है
भवेश दिलशाद
मिलती मुद्दत में है और पल में हँसी जाती है
भवेश दिलशाद
कहाँ पहुँचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है
भवेश दिलशाद
कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी
भवेश दिलशाद
ये कह दो बस मौत से हो रुख़्सत क्यूँ नाहक़ आई है उस की शामत
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ये चार दिन के तमाशे हैं आह दुनिया के
भारतेंदु हरिश्चंद्र
क़ब्र में राहत से सोए थे न था महशर का ख़ौफ़
भारतेंदु हरिश्चंद्र
मसल सच है बशर की क़दर नेमत ब'अद होती है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
किसी पहलू नहीं आराम आता तेरे आशिक़ को
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा हो
भारतेंदु हरिश्चंद्र
रहे न एक भी बेदाद-गर सितम बाक़ी
भारतेंदु हरिश्चंद्र
फिर मुझे लिखना जो वस्फ़-ए-रू-ए-जानाँ हो गया
भारतेंदु हरिश्चंद्र
फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
नींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ख़याल-ए-नावक-ए-मिज़्गाँ में बस हम सर पटकते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
जहाँ देखो वहाँ मौजूद मेरा कृष्ण प्यारा है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ब है सुर्मा दे कर आज वो बाहर निकलते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में
भारतेंदु हरिश्चंद्र
फ़साद-ए-दुनिया मिटा चुके हैं हुसूल-ए-हस्ती मिटा चुके हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
दिल मिरा तीर-ए-सितम-गर का निशाना हो गया
भारतेंदु हरिश्चंद्र
दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा
भारतेंदु हरिश्चंद्र
दश्त-पैमाई का गर क़स्द मुकर्रर होगा
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बैठे जो शाम से तिरे दर पे सहर हुई
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी
भारतेंदु हरिश्चंद्र
असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
अजब जौबन है गुल पर आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया
भारतेंदु हरिश्चंद्र
याद भी आता नहीं कुछ भूलता भी कुछ नहीं
भारत भूषण पन्त
मैं थोड़ी देर भी आँखों को अपनी बंद कर लूँ तो
भारत भूषण पन्त