Heart Broken Poetry (page 181)
मैं अब जो हर किसी से अजनबी सा पेश आता हूँ
भारत भूषण पन्त
हर घड़ी तेरा तसव्वुर हर नफ़स तेरा ख़याल
भारत भूषण पन्त
अब तो इतनी बार हम रस्ते में ठोकर खा चुके
भारत भूषण पन्त
वो चुप था दीदा-ए-नम बोलते थे
भारत भूषण पन्त
सवाब है या किसी जनम का हिसाब कोई चुका रहा हूँ
भारत भूषण पन्त
समुंदरों को भी दरिया समझ रहे हैं हम
भारत भूषण पन्त
सच्चाइयों को बर-सर-ए-पैकार छोड़ कर
भारत भूषण पन्त
सब ने होंटों से लगा कर तोड़ डाला है मुझे
भारत भूषण पन्त
रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं
भारत भूषण पन्त
क़ुर्बतें नहीं रक्खीं फ़ासला नहीं रक्खा
भारत भूषण पन्त
फिर वो बे-सम्त उड़ानों की कहानी सुन कर
भारत भूषण पन्त
पराया लग रहा था जो वही अपना निकल आया
भारत भूषण पन्त
मुस्तक़िल रोने से दिल की बे-कली बढ़ जाएगी
भारत भूषण पन्त
मिरी ही बात सुनती है मुझी से बात करती है
भारत भूषण पन्त
मैं ने सोचा था मुझे मिस्मार कर सकता नहीं
भारत भूषण पन्त
मैं क्या बताऊँ कैसी परेशानियों में हूँ
भारत भूषण पन्त
लाख टकराते फिरें हम सर दर-ओ-दीवार से
भारत भूषण पन्त
कुछ न कुछ सिलसिला ही बन जाता
भारत भूषण पन्त
किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है
भारत भूषण पन्त
ख़्वाहिशों से वलवलों से दूर रहना चाहिए
भारत भूषण पन्त
ख़्वाहिश-ए-पर्वाज़ है तो बाल-ओ-पर भी चाहिए
भारत भूषण पन्त
ख़्वाब जीने नहीं देंगे तुझे ख़्वाबों से निकल
भारत भूषण पन्त
ख़ुद पर जो ए'तिमाद था झूटा निकल गया
भारत भूषण पन्त
कहीं जैसे मैं कोई चीज़ रख कर भूल जाता हूँ
भारत भूषण पन्त
कभी सुकूँ कभी सब्र-ओ-क़रार टूटेगा
भारत भूषण पन्त
कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर
भारत भूषण पन्त
कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे
भारत भूषण पन्त
जुस्तुजू मेरी कहीं थी और मैं भटका कहीं
भारत भूषण पन्त
इश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझ को
भारत भूषण पन्त
हर एक रात में अपना हिसाब कर के मुझे
भारत भूषण पन्त