Heart Broken Poetry (page 183)
तुम हमारे दिल-ए-शैदा को नहीं जानते क्या
बेख़ुद देहलवी
तेशे से कोई काम न फ़रहाद से हुआ
बेख़ुद देहलवी
शम-ए-मज़ार थी न कोई सोगवार था
बेख़ुद देहलवी
सब्र आता है जुदाई में न ख़्वाब आता है
बेख़ुद देहलवी
क़यामत है जो ऐसे पर दिल-ए-उम्मीद-वार आए
बेख़ुद देहलवी
पछताओगे फिर हम से शरारत नहीं अच्छी
बेख़ुद देहलवी
न सही आप हमारे जो मुक़द्दर में नहीं
बेख़ुद देहलवी
न क्यूँ-कर नज़्र दिल होता न क्यूँ-कर दम मिरा जाता
बेख़ुद देहलवी
न अरमाँ बन के आते हैं न हसरत बन के आते हैं
बेख़ुद देहलवी
मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद
बेख़ुद देहलवी
मेरे हम-राह मिरे घर पे भी आफ़त आई
बेख़ुद देहलवी
माशूक़ हमें बात का पूरा नहीं मिलता
बेख़ुद देहलवी
लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें
बेख़ुद देहलवी
क्या मिले आप की महफ़िल में भला एक से एक
बेख़ुद देहलवी
ख़ुदा रक्खे तुझे मेरी बुराई देखने वाले
बेख़ुद देहलवी
कब तक करेंगे जब्र दिल-ए-ना-सुबूर पर
बेख़ुद देहलवी
जो तमाशा नज़र आया उसे देखा समझा
बेख़ुद देहलवी
झूट सच आप तो इल्ज़ाम दिए जाते हैं
बेख़ुद देहलवी
हुआ जो वक़्फ़-ए-ग़म वो दिल किसी का हो नहीं सकता
बेख़ुद देहलवी
हो के मजबूर आह करता हूँ
बेख़ुद देहलवी
हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा
बेख़ुद देहलवी
हज़रत-ए-दिल ये इश्क़ है दर्द से कसमसाए क्यूँ
बेख़ुद देहलवी
हर एक बात तिरी बे-सबात कितनी है
बेख़ुद देहलवी
दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो
बेख़ुद देहलवी
दिल है मुश्ताक़ जुदा आँख तलबगार जुदा
बेख़ुद देहलवी
दिल चुरा ले गई दुज़्दीदा-नज़र देख लिया
बेख़ुद देहलवी
दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर
बेख़ुद देहलवी
बेवफ़ा कहने से क्या वो बेवफ़ा हो जाएगा
बेख़ुद देहलवी
बेताब रहें हिज्र में कुछ दिल तो नहीं हम
बेख़ुद देहलवी
बेचने आए कोई क्या दिल-ए-शैदा ले कर
बेख़ुद देहलवी