Heart Broken Poetry (page 178)
ज़ब्त-ए-नाला दिल-ए-फ़िगार न कर
बिर्ज लाल रअना
मोहब्बत नग़्मा भी है साज़ भी है
बिर्ज लाल रअना
ख़याल को ज़ौ नज़र को ताबिश नफ़स को रख़शंदगी मिलेगी
बिर्ज लाल रअना
दुनिया में वफ़ा-केश बशर ढूँढ रहा हूँ
बिर्ज लाल रअना
आरज़ूएँ नज़्र-ए-दौराँ नज़्र-ए-जानाँ हो गईं
बिर्ज लाल रअना
आप अपने रक़ीब हैं हम लोग
बिर्ज लाल रअना
दायरा खींच के बैठा हूँ बड़ी मुद्दत से
बिमल कृष्ण अश्क
अब यही दुख है हमीं में थी कमी उस में न थी
बिमल कृष्ण अश्क
अब के बसंत आई तो आँखें उजड़ गईं
बिमल कृष्ण अश्क
नज़्म
बिमल कृष्ण अश्क
नाम उस का
बिमल कृष्ण अश्क
एआद-ए-हिकायतें
बिमल कृष्ण अश्क
उन की गोद में सर रख कर जब आँसू आँसू रोया था
बिमल कृष्ण अश्क
तुझ जैसा इक आँचल चाहूँ अपने जैसा दामन ढूँडूँ
बिमल कृष्ण अश्क
कैसे कहें कि चार तरफ़ दायरा न था
बिमल कृष्ण अश्क
जो दिल में उस को बसाए वो और कुछ न करे
बिमल कृष्ण अश्क
जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था
बिमल कृष्ण अश्क
जिस की हर बात में क़हक़हा जज़्ब था मैं न था दोस्तो
बिमल कृष्ण अश्क
इतना अच्छा न अगर होता तो हम सा होता
बिमल कृष्ण अश्क
हम से भली चाल चली चाँदनी
बिमल कृष्ण अश्क
चाँद को रेशमी बादल से उलझता देखूँ
बिमल कृष्ण अश्क
मातम-कदा बना है गुलिस्ताँ तिरे बग़ैर
बिल्क़ीस बेगम
मेरी तरह टूटे आईने में उस ने भी
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
है यूँ कि कुछ तो बग़ावत-सिरिश्त हम भी हैं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
दहशत-ज़दा ज़मीं पर वहशत भरे मकाँ ये
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
शाम से हम ता सहर चलते रहे
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
कोई आहट कोई सरगोशी सदा कुछ भी नहीं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
काँटे हों या फूल अकेले चुनना होगा
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
कब एक रंग में दुनिया का हाल ठहरा है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन