Hope Poetry (page 167)
वक़्त की क़द्र
अख़्तर शीरानी
ओ देस से आने वाले बता
अख़्तर शीरानी
नज़्र-ए-वतन
अख़्तर शीरानी
जहाँ 'रेहाना' रहती थी
अख़्तर शीरानी
दिल-ओ-दिमाग़ को रो लूँगा आह कर लूँगा
अख़्तर शीरानी
दावत
अख़्तर शीरानी
बदनाम हो रहा हूँ
अख़्तर शीरानी
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
अख़्तर शीरानी
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
अख़्तर शीरानी
ज़मान-ए-हिज्र मिटे दौर-ए-वस्ल-ए-यार आए
अख़्तर शीरानी
यक़ीन-ए-वादा नहीं ताब-ए-इंतिज़ार नहीं
अख़्तर शीरानी
वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें
अख़्तर शीरानी
वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए
अख़्तर शीरानी
उम्र भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं
अख़्तर शीरानी
तमन्नाओं को ज़िंदा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ
अख़्तर शीरानी
सू-ए-कलकत्ता जो हम ब-दिल-ए-दीवाना चले
अख़्तर शीरानी
निकहत-ए-ज़ुल्फ़ से नींदों को बसा दे आ कर
अख़्तर शीरानी
न वो ख़िज़ाँ रही बाक़ी न वो बहार रही
अख़्तर शीरानी
न भूल कर भी तमन्ना-ए-रंग-ओ-बू करते
अख़्तर शीरानी
मोहब्बत की दुनिया में मशहूर कर दूँ
अख़्तर शीरानी
मिरी शाम-ए-ग़म को वो बहला रहे हैं
अख़्तर शीरानी
मैं आरज़ू-ए-जाँ लिखूँ या जान-ए-आरज़ू!
अख़्तर शीरानी
ला पिला साक़ी शराब-ए-अर्ग़वानी फिर कहाँ
अख़्तर शीरानी
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता
अख़्तर शीरानी
किस को देखा है ये हुआ क्या है
अख़्तर शीरानी
काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें
अख़्तर शीरानी
झूम कर बदली उठी और छा गई
अख़्तर शीरानी
हर एक जल्वा-ए-रंगीं मिरी निगाह में है
अख़्तर शीरानी
हमारे हाथ में कब साग़र-ए-शराब नहीं
अख़्तर शीरानी
दिल में ख़याल-ए-नर्गिस-ए-जानाना आ गया
अख़्तर शीरानी