Hope Poetry (page 169)
कैसे समझाऊँ नसीम-ए-सुब्ह तुझ को क्या हूँ मैं
अख़्तर सईद ख़ान
कभी ज़बाँ पे न आया कि आरज़ू क्या है
अख़्तर सईद ख़ान
गुज़रना है जी से गुज़र जाइए
अख़्तर सईद ख़ान
दिल-ए-शोरीदा की वहशत नहीं देखी जाती
अख़्तर सईद ख़ान
दीदनी है ज़ख़्म-ए-दिल और आप से पर्दा भी क्या
अख़्तर सईद ख़ान
चंद उलझी हुई साँसों की अता हूँ क्या हूँ
अख़्तर सईद ख़ान
तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे
अख़्तर रज़ा सलीमी
तुझे ख़बर नहीं इस बात की अभी शायद
अख़्तर रज़ा सलीमी
वो भी क्या दिन थे क्या ज़माने थे
अख़्तर रज़ा सलीमी
तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे
अख़्तर रज़ा सलीमी
दिल ओ निगाह पे तारी रहे फ़ुसूँ उस का
अख़्तर रज़ा सलीमी
काला सूरज
अख़्तर राही
रिवायात की तख़्लीक़
अख़्तर पयामी
लम्स-ए-आख़िरी
अख़्तर पयामी
मिरी आरज़ू की तस्कीं न करम में ने सितम में
अख़्तर ओरेनवी
मैं मुंतज़िर हूँ तेरी तमन्ना लिए हुए
अख़्तर ओरेनवी
नश्तर से आरज़ू के दिल-ए-ज़िंदगी फ़िगार
अख़्तर ओरेनवी
मक़ाम-ए-दिल बहुत ऊँचा बना है
अख़्तर ओरेनवी
दारू-ए-होश-रुबा नर्गिस-ए-बीमार तो हो
अख़्तर ओरेनवी
मिरी तरफ़ से तो टूटा नहीं कोई रिश्ता
अख़्तर नज़्मी
जो भी मिल जाता है घर-बार को दे देता हूँ
अख़्तर नज़्मी
सब्र-ओ-क़रार-ए-दिल मिरे जाने कहाँ चले गए
अख़तर मुस्लिमी
देहात के बसने वाले तो इख़्लास के पैकर होते हैं
अख़तर मुस्लिमी
शिकवा इस का तो नहीं है जो करम छोड़ दिया
अख़तर मुस्लिमी
नाले मिरे जब तक मिरे काम आते रहेंगे
अख़तर मुस्लिमी
किस को कहते हैं जफ़ा क्या है वफ़ा याद नहीं
अख़तर मुस्लिमी
दिल ही रह-ए-तलब में न खोना पड़ा मुझे
अख़तर मुस्लिमी
दरिया नज़र न आए न सहरा दिखाई दे
अख़तर मुस्लिमी
क़ुर्ब के न वफ़ा के होते हैं
अख़्तर मालिक
सू-ए-मक़्तल कोई दम साथ चले
अख्तर लख़नवी