Hope Poetry (page 170)
रौनक़ ही नहीं उस की हम रूह-ओ-रवाँ भी हैं
अख्तर लख़नवी
किसी का चेहरा किसी पर सजा नहीं देता
अख्तर लख़नवी
होश्यार कर रहा है गजर जागते रहो
अख्तर लख़नवी
दिल के हर ज़ख़्म को पलकों पे सजाया तो गया
अख्तर लख़नवी
वो ख़ुद तो मर ही गया था मुझे भी मार गया
अख़तर इमाम रिज़वी
जुर्म-ए-हस्ती की सज़ा क्यूँ नहीं देते मुझ को
अख़तर इमाम रिज़वी
अपना दुख अपना है प्यारे ग़ैर को क्यूँ उलझाओगे
अख़तर इमाम रिज़वी
तपिश गुलज़ार तक पहुँची लहू दीवार तक आया
अख़्तर हुसैन जाफ़री
शाख़-ए-तन्हाई से फिर निकली बहार-ए-फ़स्ल-ए-ज़ात
अख़्तर हुसैन जाफ़री
उदास कोहसार के नौहे
अख़्तर हुसैन जाफ़री
तेरा पार उतरना कैसा
अख़्तर हुसैन जाफ़री
सुख़न दरमाँदा है
अख़्तर हुसैन जाफ़री
इक हर्फ़-ए-फ़सुर्दा दाग़ में है
अख़्तर हुसैन जाफ़री
तपिश गुलज़ार तक पहुँची लहू दीवार तक आया
अख़्तर हुसैन जाफ़री
सब ख़याल उस के लिए हैं सब सवाल उस के लिए
अख़्तर हुसैन जाफ़री
वो शायद कोई सच्ची बात कह दे
अख़्तर होशियारपुरी
ज़मीन पर ही रहे आसमाँ के होते हुए
अख़्तर होशियारपुरी
यक-ब-यक मौसम की तब्दीली क़यामत ढा गई
अख़्तर होशियारपुरी
वो रंग-ए-तमन्ना है कि सद-रंग हुआ हूँ
अख़्तर होशियारपुरी
वो जो दीवार-ए-आश्नाई थी
अख़्तर होशियारपुरी
उफ़ुक़ उफ़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं
अख़्तर होशियारपुरी
तूफ़ान-ए-अब्र-ओ-बाद से हर-सू नमी भी है
अख़्तर होशियारपुरी
शायान-ए-ज़िंदगी न थे हम मो'तबर न थे
अख़्तर होशियारपुरी
शाम तन्हाई धुआँ उठता बराबर देखते
अख़्तर होशियारपुरी
रुख़्सत-ए-रक़्स भी है पाँव में ज़ंजीर भी है
अख़्तर होशियारपुरी
पहले तो सोच के दोज़ख़ में जलाता है मुझे
अख़्तर होशियारपुरी
मेरे लहू में उस ने नया रंग भर दिया
अख़्तर होशियारपुरी
मैं ने यूँ देखा उसे जैसे कभी देखा न था
अख़्तर होशियारपुरी
क्या पूछते हो मुझ से कि मैं किस नगर का था
अख़्तर होशियारपुरी
कुछ नक़्श हुवैदा हैं ख़यालों की डगर से
अख़्तर होशियारपुरी