Hope Poetry (page 172)
क़सम इन आँखों की जिन से लहू टपकता है
अख़्तर अंसारी
फूल सूँघे जाने क्या याद आ गया
अख़्तर अंसारी
मोहब्बत करने वालों के बहार-अफ़रोज़ सीनों में
अख़्तर अंसारी
मोहब्बत है अज़िय्यत है हुजूम-ए-यास-ओ-हसरत है
अख़्तर अंसारी
लुत्फ़ ले ले के पिए हैं क़दह-ए-ग़म क्या क्या
अख़्तर अंसारी
कोई मआल-ए-मोहब्बत मुझे बताओ नहीं
अख़्तर अंसारी
किसी से लड़ाएँ नज़र और झेलें मोहब्बत के ग़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ
अख़्तर अंसारी
ख़्वाहिश-ए-ऐश नहीं दर्द-ए-निहानी की क़सम
अख़्तर अंसारी
ख़िज़ाँ में आग लगाओ बहार के दिन हैं
अख़्तर अंसारी
जो दाग़ बन के तमन्ना तमाम हो जाए
अख़्तर अंसारी
हयात इंसाँ की सर ता पा ज़बाँ मालूम होती है
अख़्तर अंसारी
हर वक़्त नौहा-ख़्वाँ सी रहती हैं मेरी आँखें
अख़्तर अंसारी
ग़म-ए-हयात कहानी है क़िस्सा-ख़्वाँ हूँ मैं
अख़्तर अंसारी
दिल-ए-फ़सुर्दा में कुछ सोज़ ओ साज़ बाक़ी है
अख़्तर अंसारी
दिल के अरमान दिल को छोड़ गए
अख़्तर अंसारी
बहार-ए-फ़िक्र के जल्वे लुटा दिए हम ने
अख़्तर अंसारी
बहार आई ज़माना हुआ ख़राबाती
अख़्तर अंसारी
अपनी बहार पे हँसने वालो कितने चमन ख़ाशाक हुए
अख़्तर अंसारी
अब वो सीना है मज़ार-ए-आरज़ू
अख़्तर अंसारी
आरज़ू को रूह में ग़म बन के रहना आ गया
अख़्तर अंसारी
यहाँ मौसम भी बदलें तो नज़ारे एक जैसे हैं
अख़्तर अमान
वही है गर्दिश-ए-दौराँ वही लैल-ओ-नहार अब भी
अख़लाक़ बन्दवी
कभी जो आँखों में पल-भर को ख़्वाब जागते हैं
अख़लाक़ बन्दवी
जुस्तुजू ने तिरी हर चंद थका रक्खा है
अख़लाक़ बन्दवी
इधर चराग़ जल गए उधर चराग़ जल गए
अख़लाक़ बन्दवी
महबूबा और मौत
अख़लाक़ अहमद आहन
जला के दिल को रखा सुब्ह-ओ-शाम रोज़-ओ-शब
अख़लाक़ अहमद आहन
वह शक्ल वह शनाख़्त वह पैकर की आरज़ू
अखिलेश तिवारी
उड़ा के फिर वही गर्द-ओ-ग़ुबार पहले सा
अखिलेश तिवारी
मुलाहिज़ा हो मिरी भी उड़ान पिंजरे में
अखिलेश तिवारी