Hope Poetry (page 174)
क्या वो ख़्वाहिश कि जिसे दिल भी समझता हो हक़ीर
अकबर इलाहाबादी
जवानी की दुआ लड़कों को ना-हक़ लोग देते हैं
अकबर इलाहाबादी
जान शायद फ़रिश्ते छोड़ भी दें
अकबर इलाहाबादी
मिस सीमीं बदन
अकबर इलाहाबादी
मदरसा अलीगढ़
अकबर इलाहाबादी
फ़र्ज़ी लतीफ़ा
अकबर इलाहाबादी
दरबार1911
अकबर इलाहाबादी
बर्क़-ए-कलीसा
अकबर इलाहाबादी
यूँ मिरी तब्अ से होते हैं मआनी पैदा
अकबर इलाहाबादी
उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है
अकबर इलाहाबादी
रंग-ए-शराब से मिरी निय्यत बदल गई
अकबर इलाहाबादी
फिर गई आप की दो दिन में तबीअ'त कैसी
अकबर इलाहाबादी
नई तहज़ीब से साक़ी ने ऐसी गर्म-जोशी की
अकबर इलाहाबादी
न रूह-ए-मज़हब न क़ल्ब-ए-आरिफ़ न शाइराना ज़बान बाक़ी
अकबर इलाहाबादी
लुत्फ़ चाहो इक बुत-ए-नौ-ख़ेज़ को राज़ी करो
अकबर इलाहाबादी
ख़ुशी क्या हो जो मेरी बात वो बुत मान जाता है
अकबर इलाहाबादी
ख़ुदा अलीगढ़ की मदरसे को तमाम अमराज़ से शिफ़ा दे
अकबर इलाहाबादी
ख़त्म किया सबा ने रक़्स गुल पे निसार हो चुकी
अकबर इलाहाबादी
जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श का शैदा होगा
अकबर इलाहाबादी
जल्वा अयाँ है क़ुदरत-ए-परवरदिगार का
अकबर इलाहाबादी
जहाँ में हाल मिरा इस क़दर ज़बून हुआ
अकबर इलाहाबादी
जब यास हुई तो आहों ने सीने से निकलना छोड़ दिया
अकबर इलाहाबादी
इश्क़-ए-बुत में कुफ़्र का मुझ को अदब करना पड़ा
अकबर इलाहाबादी
हर इक ये कहता है अब कार-ए-दीं तो कुछ भी नहीं
अकबर इलाहाबादी
गले लगाएँ करें प्यार तुम को ईद के दिन
अकबर इलाहाबादी
फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं
अकबर इलाहाबादी
दश्त-ए-ग़ुर्बत है अलालत भी है तन्हाई भी
अकबर इलाहाबादी
चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहीं
अकबर इलाहाबादी
बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
अकबर इलाहाबादी
आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते
अकबर इलाहाबादी