Hope Poetry (page 176)

यूँ तुझ से दूर दूर रहूँ ये सज़ा न दे

आजिज़ मातवी

मय-ख़ाने पर काले बादल जब घिर घिर कर आते हैं

आजिज़ मातवी

क्यूँ कहूँ कोई क़द-आवर नहीं आया अब तक

आजिज़ मातवी

जहाँ न दिल को सुकून है न है क़रार मुझे

आजिज़ मातवी

हसरतें आ आ के जम्अ हो रही हैं दिल के पास

आजिज़ मातवी

हर-सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँडते हैं हम

आजिज़ मातवी

दर्द-ए-मुसलसल से आहों में पैदा वो तासीर हुई

आजिज़ मातवी

ज़िंदगी में प्यार का सौदा करो

अजीत सिंह हसरत

ख़ाक में मिलना था आख़िर बे-निशाँ होना ही था

अजीत सिंह हसरत

जुस्तुजू में कमाल करता जा

अजीत सिंह हसरत

इश्क़ जन्मों का है सफ़र शायद

अजीत सिंह हसरत

इस चमन का अजीब माली है

अजीत सिंह हसरत

गुज़रे जिधर से नूर बिखेरे चले गए

अजीत सिंह हसरत

इक याद सो रहे को उठाती है आज भी

अजीत सिंह हसरत

धुआँ सिफ़त हूँ ख़लाओं का है सफ़र मुझ को

अजीत सिंह हसरत

आख़िरी उम्मीद भी आँखों से छलकाए हुए

अजीत सिंह हसरत

यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आए

अजय सहाब

वो जो फूल थे तिरी याद के तह-ए-दस्त-ए-ख़ार चले गए

अजय सहाब

शाम आई है लिए हाथ में यादों के चराग़

अजय सहाब

लगा के धड़कन में आग मेरी ब-रंग-ए-रक़्स-ए-शरर गया वो

अजय सहाब

जब भी मिलते हैं तो जीने की दुआ देते हैं

अजय सहाब

हम भी गुज़र गए यहाँ कुछ पल गुज़ार के

अजय सहाब

बिखरा हूँ जब मैं ख़ुद यहाँ कोई मुझे गिराए क्यूँ

अजय सहाब

अश्कों से कब मिटे हैं दामन के दाग़ यारो

अजय सहाब

किसे पाने की ख़्वाहिश है कि 'साजिद'

ऐतबार साजिद

जो मिरी शबों के चराग़ थे जो मिरी उमीद के बाग़ थे

ऐतबार साजिद

दिए मुंडेर प रख आते हैं हम हर शाम न जाने क्यूँ

ऐतबार साजिद

तिलिस्म-ज़ार-ए-शब-ए-माह में गुज़र जाए

ऐतबार साजिद

तिरे जैसा मेरा भी हाल था न सुकून था न क़रार था

ऐतबार साजिद

तर्क-ए-तअल्लुक़ कर तो चुके हैं इक इम्कान अभी बाक़ी है

ऐतबार साजिद