Hope Poetry (page 177)
रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया
ऐतबार साजिद
न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का
ऐतबार साजिद
मिरी रूह में जो उतर सकें वो मोहब्बतें मुझे चाहिएँ
ऐतबार साजिद
मैं तकिए पर सितारे बो हा हूँ
ऐतबार साजिद
कैसे कहीं कि जान से प्यारा नहीं रहा
ऐतबार साजिद
कभी तू ने ख़ुद भी सोचा कि ये प्यास है तो क्यूँ है
ऐतबार साजिद
जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
ऐतबार साजिद
घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना
ऐतबार साजिद
दिल हैं यूँ मुज़्तरिब मकानों में
ऐतबार साजिद
बंदे ज़मीन और आसमाँ सरमा की शब कहानियाँ
ऐतबार साजिद
आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया
ऐतबार साजिद
बे-सबाती चमन-ए-दहर की है जिन पे खुली
ऐश देहलवी
तू ही इंसाफ़ से कह जिस का ख़फ़ा यार रहे
ऐश देहलवी
फिरा किसी का इलाही किसी से यार न हो
ऐश देहलवी
मेरा शिकवा तिरी महफ़िल में अदू करते हैं
ऐश देहलवी
जिस दिल में तिरी ज़ुल्फ़ का सौदा नहीं होता
ऐश देहलवी
बातें न किस ने हम को कहीं तेरे वास्ते
ऐश देहलवी
मैं हँस रहा था गरचे मिरे दिल में दर्द था
ऐश बर्नी
हर इक शय पर बहार-ए-ज़िंदगी महसूस करता हूँ
ऐश बर्नी
तुम्हारे बिन अब के जान-ए-जाँ मैं ने ईद करने की ठान ली है
ऐनुद्दीन आज़िम
मेरे हमराह सितारे कभी जुगनू निकले
ऐनुद्दीन आज़िम
जो मैं ने कह दिया उस से मुकरने वाला नहीं
ऐनुद्दीन आज़िम
पहले तो शहर ऐसा न था
ऐन ताबिश
मुलाक़ातें नहीं फिर भी मुलाक़ातें
ऐन ताबिश
इक शहर था इक बाग़ था
ऐन ताबिश
अदम से परे
ऐन ताबिश
आँसुओं के रतजगों से
ऐन ताबिश
वही जुनूँ की सोख़्ता-जानी वही फ़ुसूँ अफ़्सानों का
ऐन ताबिश
ख़ाकसारी थी कि बिन देखे ही हम ख़ाक हुए
ऐन ताबिश
जी रहे हैं आफ़ियत में तो हुनर ख़्वाबों का है
ऐन ताबिश