Hope Poetry (page 175)
आज आराइ-ए-शगेसू-ए-दोता होती है
अकबर इलाहाबादी
ये शौक़ सारे यक़ीन-ओ-गुमाँ से पहले था
अकबर अली खान अर्शी जादह
सज़ा है किस के लिए और जज़ा है किस के लिए
अकबर अली खान अर्शी जादह
सन्नाटा तूफ़ाँ से सिवा हो ये भी तो हो सकता है
अकबर अली खान अर्शी जादह
मिरे ख़्वाबों में ख़यालों में मिरे पास रहो
अकबर अली खान अर्शी जादह
ख़ुश-रंग किस क़दर ख़स-ओ-ख़ाशाक थे कभी
अकबर अली खान अर्शी जादह
आज यूँ मुझ से मिला है कि ख़फ़ा हो जैसे
अकबर अली खान अर्शी जादह
किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है
अजमल सिराज
तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँगा मैं
अजमल सिराज
सुनी है चाप बहुत वक़्त के गुज़रने की
अजमल सिराज
नज़र आ रहे हैं जो तन्हा से हम
अजमल सिराज
किसी की क़ैद से आज़ाद हो के रह गए हैं
अजमल सिराज
किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है
अजमल सिराज
दुश्वार है इस अंजुमन-आरा को समझना
अजमल सिराज
दीवार याद आ गई दर याद आ गया
अजमल सिराज
कभी ख़ौफ़ था तिरे हिज्र का कभी आरज़ू के ज़वाल का
अजमल सिद्दीक़ी
हर एक सुब्ह वज़ू करती हैं मिरी आँखें
अजमल सिद्दीक़ी
ज़िंदगी रोज़ बनाती है बहाने क्या क्या
अजमल सिद्दीक़ी
न नज़र से कोई गुज़र सका न ही दिल से मलबा हटा सका
अजमल सिद्दीक़ी
खुल के बरसना और बरस कर फिर खुल जाना देखा है
अजमल सिद्दीक़ी
ख़त जो तेरे नाम लिखा, तकिए के नीचे रखता हूँ
अजमल सिद्दीक़ी
इतना करम इतनी अता फिर हो न हो
अजमल सिद्दीक़ी
दुखे दिलों पे जो पड़ जाए वो तबीब नज़र
अजमल सिद्दीक़ी
जब भी मिलता हूँ वही चेहरा लिए
अजमल अजमली
आरज़ू थी खींचते हम भी कोई अक्स-ए-हयात
अजमल अजमली
याद-ए-फ़िराक-ए-यार तिरा शुक्रिया बहुत
अजमल अजमली
शहर शहर ढूँड आए दर-ब-दर पुकार आए
अजमल अजमली
रास्ते के पेच-ओ-ख़म क्या शय हैं सोचा ही नहीं
अजमल अजमली
हर घड़ी रहता है अब ख़दशा मुझे
अजमल अजमली
होता है महसूस ये 'आजिज़' शायद उस ने दस्तक दी
आजिज़ मातवी