Hope Poetry (page 182)

वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे

अहमद नदीम क़ासमी

तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ

अहमद नदीम क़ासमी

तंग आ जाते हैं दरिया जो कुहिस्तानों में

अहमद नदीम क़ासमी

मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ

अहमद नदीम क़ासमी

मैं वो शाएर हूँ जो शाहों का सना-ख़्वाँ न हुआ

अहमद नदीम क़ासमी

मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे

अहमद नदीम क़ासमी

लब-ए-ख़ामोश से इफ़्शा होगा

अहमद नदीम क़ासमी

खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए

अहमद नदीम क़ासमी

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा

अहमद नदीम क़ासमी

जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ

अहमद नदीम क़ासमी

जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी

अहमद नदीम क़ासमी

जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम

अहमद नदीम क़ासमी

होता नहीं ज़ौक़-ए-ज़िंदगी कम

अहमद नदीम क़ासमी

हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है

अहमद नदीम क़ासमी

इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़-ओ-समा दे दूँगा

अहमद नदीम क़ासमी

एहसास में फूल खिल रहे हैं

अहमद नदीम क़ासमी

दिलों से आरज़ू-ए-उम्र-ए-जावेदाँ न गई

अहमद नदीम क़ासमी

बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था

अहमद नदीम क़ासमी

अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के

अहमद नदीम क़ासमी

वहाँ सलाम को आती है नंगे पाँव बहार

अहमद मुश्ताक़

ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे

अहमद मुश्ताक़

ये कौन ख़्वाब में छू कर चला गया मिरे लब

अहमद मुश्ताक़

ये कहना तो नहीं काफ़ी कि बस प्यारे लगे हम को

अहमद मुश्ताक़

ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं

अहमद मुश्ताक़

टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया

अहमद मुश्ताक़

शाम होती है तो याद आती है सारी बातें

अहमद मुश्ताक़

रौशनी रहती थी दिल में ज़ख़्म जब तक ताज़ा था

अहमद मुश्ताक़

पानी में अक्स और किसी आसमाँ का है

अहमद मुश्ताक़

नाला-ए-ख़ूनीं से रौशन दर्द की रातें करो

अहमद मुश्ताक़

मलाल-ए-दिल से इलाज-ए-ग़म-ए-ज़माना किया

अहमद मुश्ताक़