Hope Poetry (page 181)

ख़ाक देखी है शफ़क़-ज़ार फ़लक देखा है

अहमद रिज़वान

बात करने का नहीं सामने आने का नहीं

अहमद रिज़वान

दूर तेरी महफ़िल से रात दिन सुलगता हूँ

अहमद राही

अब न काबा की तमन्ना न किसी बुत की हवस

अहमद राही

वक़्त की बात

अहमद राही

लब-ए-गोया

अहमद राही

ग़म-गुसारी

अहमद राही

वो बे-नियाज़ मुझे उलझनों में डाल गया

अहमद राही

तवील रातों की ख़ामुशी में मिरी फ़ुग़ाँ थक के सो गई है

अहमद राही

तवील रातों की ख़ामुशी में मिरी फ़ुग़ाँ थक के सो गई है

अहमद राही

क़द ओ गेसू लब-ओ-रुख़्सार के अफ़्साने चले

अहमद राही

कोई हसरत भी नहीं कोई तमन्ना भी नहीं

अहमद राही

कभी तिरी कभी अपनी हयात का ग़म है

अहमद राही

कभी हयात का ग़म है कभी तिरा ग़म है

अहमद राही

जिस राह से भी गुज़र गए हम

अहमद राही

ग़म-ए-हयात में कोई कमी नहीं आई

अहमद राही

दिन को रहते झील पर दरिया किनारे रात को

अहमद राही

तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता

अहमद नदीम क़ासमी

किस तवक़्क़ो पे किसी को देखें

अहमद नदीम क़ासमी

आख़िर दुआ करें भी तो किस मुद्दआ के साथ

अहमद नदीम क़ासमी

वक़्त

अहमद नदीम क़ासमी

तदफ़ीन

अहमद नदीम क़ासमी

सफ़र और हम-सफ़र

अहमद नदीम क़ासमी

रूह लबों तक आ कर सोचे

अहमद नदीम क़ासमी

रेस्तोराँ

अहमद नदीम क़ासमी

नया साल

अहमद नदीम क़ासमी

महफ़िल-ए-शब

अहमद नदीम क़ासमी

लरज़ते साए

अहमद नदीम क़ासमी

एक दरख़्वास्त

अहमद नदीम क़ासमी

यूँ तो पहने हुए पैराहन-ए-ख़ार आता हूँ

अहमद नदीम क़ासमी