Hope Poetry (page 183)

लाग़र हैं जिस्म रंग हैं काले पड़े हुए

अहमद मुश्ताक़

किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता

अहमद मुश्ताक़

किस रक़्स-ए-जान-आे-तन में मिरा दिल नहीं रहा

अहमद मुश्ताक़

किस झुटपुटे के रंग उजालों में आ गए

अहमद मुश्ताक़

ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं

अहमद मुश्ताक़

ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना

अहमद मुश्ताक़

खड़े हैं दिल में जो बर्ग-ओ-समर लगाए हुए

अहमद मुश्ताक़

कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी

अहमद मुश्ताक़

कहीं उम्मीद सी है दिल के निहाँ ख़ाने में

अहमद मुश्ताक़

कभी ख़्वाहिश न हुई अंजुमन-आराई की

अहमद मुश्ताक़

हम गिरे हैं जो आ के इतनी दूर

अहमद मुश्ताक़

हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को

अहमद मुश्ताक़

हर लम्हा ज़ुल्मतों की ख़ुदाई का वक़्त है

अहमद मुश्ताक़

इक उम्र की और ज़रूरत है वही शाम-ओ-सहर करने के लिए

अहमद मुश्ताक़

दुनिया में सुराग़-ए-रह-ए-दुनिया नहीं मिलता

अहमद मुश्ताक़

दिल में वो शोर न आँखों में वो नम रहता है

अहमद मुश्ताक़

दस्त-ए-सुमूम दस्त-ए-सबा क्यूँ नहीं हुआ

अहमद मुश्ताक़

छिन गई तेरी तमन्ना भी तमन्नाई से

अहमद मुश्ताक़

चाँद इस घर के दरीचों के बराबर आया

अहमद मुश्ताक़

चमक-दमक पे न जाओ खरी नहीं कोई शय

अहमद मुश्ताक़

भागने का कोई रस्ता नहीं रहने देते

अहमद मुश्ताक़

अजब नहीं कभी नग़्मा बने फ़ुग़ाँ मेरी

अहमद मुश्ताक़

अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं

अहमद मुश्ताक़

अब मंज़िल-ए-सदा से सफ़र कर रहे हैं हम

अहमद मुश्ताक़

आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना

अहमद मुश्ताक़

दिलों पे ज़ख़्म लगा के हज़ार गुज़री बहार

अहमद मासूम

दामन को ज़रा झटक तो देखो

अहमद महफ़ूज़

ज़ख़्म खाना ही जब मुक़द्दर हो

अहमद महफ़ूज़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

उठिए कि फिर ये मौक़ा हाथों से जा रहेगा

अहमद महफ़ूज़