Hope Poetry (page 184)

उठ जा कि अब ये मौक़ा हाथों से जा रहेगा

अहमद महफ़ूज़

उस से रिश्ता है अभी तक मेरा

अहमद महफ़ूज़

उन आँखों में रंग-ए-मय नहीं है

अहमद महफ़ूज़

उधर से आए तो फिर लौट कर नहीं गए हम

अहमद महफ़ूज़

किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए

अहमद महफ़ूज़

छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ

अहमद महफ़ूज़

आया ही नहीं कोई बोझ अपना उठाने को

अहमद महफ़ूज़

हवा के हाथ पे छाले हैं आज तक मौजूद

अहमद ख़याल

ऐन मुमकिन है कि बीनाई मुझे धोका दे

अहमद ख़याल

उसे इक अजनबी खिड़की से झाँका

अहमद ख़याल

कोई अन-देखी फ़ज़ा तस्वीर करना चाहिए

अहमद ख़याल

कल रात इक अजीब पहेली हुई हवा

अहमद ख़याल

हर एक रंग धनक की मिसाल ऐसा था

अहमद ख़याल

दस्त-बस्तों को इशारा भी तो हो सकता है

अहमद ख़याल

दश्त ओ जुनूँ का सिलसिला मेरे लहू में आ गया

अहमद ख़याल

बस्ती से चंद रोज़ किनारा करूँगा मैं

अहमद ख़याल

चंद पेड़ों को ही मजनूँ की दुआ होती है

अहमद कामरान

तुम्हारे हिज्र को काफ़ी नहीं समझता मैं

अहमद कामरान

तू ज़ियादा में से बाहर नहीं आया करता

अहमद कामरान

चराग़ ताक़-ए-तिलिस्मात में दिखाई दिया

अहमद कामरान

ख़बर नहीं है मिरे बादशाह को शायद

अहमद जावेद

दुनिया मिरे पड़ोस में आबाद है मगर

अहमद जावेद

आँधी का रजज़

अहमद जावेद

उस के लहजे का वो उतार चढ़ाओ

अहमद जावेद

निहाल-ए-वस्ल नहीं संग-बार करने को

अहमद जावेद

किसी का ध्यान मह-ए-नीम-माह में आया

अहमद जावेद

हमारी हम-नफ़सी को भी क्या दवाम हुआ

अहमद जावेद

अच्छी गुज़र रही है दिल-ए-ख़ुद-कफ़ील से

अहमद जावेद

फ़ीरोज़ी तस्बीह का घेरा हाथ में जल्वा-अफ़्गन था

अहमद जहाँगीर

मुझ से बिगड़ गए तो रक़ीबों की बन गई

अहमद हुसैन माइल