Hope Poetry (page 186)
कुछ उस को याद करूँ उस का इंतिज़ार करूँ
अहमद हमदानी
दिलों को रंज ये कैसा है ये ख़ुशी क्या है
अहमद हमदानी
दिल तुझे पा के भी तन्हा होता
अहमद हमदानी
अज़ल अबद से बहुत दूर झूमते थे हम
अहमद हमदानी
अब ये होगा शायद अपनी आग में ख़ुद जल जाएँगे
अहमद हमदानी
सब पे खुलने की हमें ही आरज़ू शायद न थी
अहमद फ़रीद
पर्दा-ए-महमिल उठे तो राज़-ए-वीराना खुले
अहमद फ़रीद
जब से इक चाँद की चाहत में सितारा हुआ हूँ
अहमद फ़रीद
यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है
अहमद फ़राज़
तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
अहमद फ़राज़
तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी
अहमद फ़राज़
मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर
अहमद फ़राज़
मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी
अहमद फ़राज़
जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र
अहमद फ़राज़
जी में जो आती है कर गुज़रो कहीं ऐसा न हो
अहमद फ़राज़
हमें भी अर्ज़-ए-तमन्ना का ढब नहीं आता
अहमद फ़राज़
दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है
अहमद फ़राज़
भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब
अहमद फ़राज़
ऐसी तारीकियाँ आँखों में बसी हैं कि 'फ़राज़'
अहमद फ़राज़
अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है
अहमद फ़राज़
अभी तो जाग रहे हैं चराग़ राहों के
अहमद फ़राज़
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
अहमद फ़राज़
अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइए
अहमद फ़राज़
अब तिरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आए
अहमद फ़राज़
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
अहमद फ़राज़
अब दिल की तमन्ना है तो ऐ काश यही हो
अहमद फ़राज़
वापसी
अहमद फ़राज़
सरहदें
अहमद फ़राज़
मुझ से पहले
अहमद फ़राज़
मुहासरा
अहमद फ़राज़