Hope Poetry (page 19)
वो आलम है कि हर मौज-ए-नफ़स है रूह पर भारी
हुरमतुल इकराम
उस के सिवा क्या अपनी दौलत
हुरमतुल इकराम
रहेगा अक़्ल के सीने पे ता-अबद ये दाग़
हुरमतुल इकराम
फ़रोग़-ए-दीदा-वरी का ज़माना आया है
हुरमतुल इकराम
जैसे कोई ज़िद्दी बच्चा कब बहले बहलाने से
हुमैरा रहमान
इन लफ़्ज़ों में ख़ुद को ढूँडूँगी मैं भी
हुमैरा रहमान
फ़सील शहर की इतनी बुलंद ओ सख़्त हुई
हुमैरा रहमान
बहुत ताख़ीर से पाया है ख़ुद को
हुमैरा राहत
वक़्त की आँख से कुछ ख़्वाब नए माँगता है
हुमैरा राहत
मैं आब-ए-इश्क़ में हल हो गई हूँ
हुमैरा राहत
कहानी को मुकम्मल जो करे वो बाब उठा लाई
हुमैरा राहत
हर एक ख़्वाब की ताबीर थोड़ी होती है
हुमैरा राहत
तज़ईन-ए-बज़्म-ए-ग़म के लिए कोई शय तो हो
होश तिर्मिज़ी
यादें चलें ख़याल चला अश्क-ए-तर चले
होश तिर्मिज़ी
वो तक़ाज़ा-ए-जुनूँ अब के बहारों में न था
होश तिर्मिज़ी
तज़ईन-ए-बज़्म-ए-ग़म के लिए कोई शय तो हो
होश तिर्मिज़ी
पास-ए-नामूस-ए-तमन्ना हर इक आज़ार में था
होश तिर्मिज़ी
मिलता नहीं मिज़ाज ख़ुद अपनी अदा में है
होश तिर्मिज़ी
लाएगा रंग ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ देखते रहो
होश तिर्मिज़ी
कभी आहें कभी नाले कभी आँसू निकले
होश तिर्मिज़ी
दिल को ग़म रास है यूँ गुल को सबा हो जैसे
होश तिर्मिज़ी
ज़िंदगी की बात सुन कर क्या कहें
हिमायत अली शाएर
मैं सोचता हूँ इस लिए शायद मैं ज़िंदा हूँ
हिमायत अली शाएर
मुद्दत के बाद
हिमायत अली शाएर
हरीफ़-ए-विसाल
हिमायत अली शाएर
दूसरा तजरबा
हिमायत अली शाएर
तख़ातुब है तुझ से ख़याल और का है
हिमायत अली शाएर
मेरा शुऊ'र मुझ को ये आज़ार दे गया
हिमायत अली शाएर
मैं सो रहा था और कोई बेदार मुझ में था
हिमायत अली शाएर
कब तक रहूँ मैं ख़ौफ़-ज़दा अपने आप से
हिमायत अली शाएर