Hope Poetry (page 18)
फिर शाम हुई
इब्न-ए-इंशा
लब पर नाम किसी का भी हो
इब्न-ए-इंशा
कातिक का चाँद
इब्न-ए-इंशा
झुलसी सी इक बस्ती में
इब्न-ए-इंशा
इस बस्ती के इक कूचे में
इब्न-ए-इंशा
दिल-आशोब
इब्न-ए-इंशा
चाँद के तमन्नाई
इब्न-ए-इंशा
ऐ मतवालो! नाक़ों वालो!!
इब्न-ए-इंशा
उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा
इब्न-ए-इंशा
पीत करना तो हम से निभाना सजन हम ने पहले ही दिन था कहा ना सजन
इब्न-ए-इंशा
लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम हुए
इब्न-ए-इंशा
इस शहर के लोगों पे ख़त्म सही ख़ु-तलअ'ती-ओ-गुल-पैरहनी
इब्न-ए-इंशा
हमें तुम पे गुमान-ए-वहशत था हम लोगों को रुस्वा किया तुम ने
इब्न-ए-इंशा
दिल सी चीज़ के गाहक होंगे दो या एक हज़ार के बीच
इब्न-ए-इंशा
दिल किस के तसव्वुर में जाने रातों को परेशाँ होता है
इब्न-ए-इंशा
देख हमारी दीद के कारन कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ
इब्न-ए-इंशा
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ
इब्न-ए-इंशा
और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का
इब्न-ए-इंशा
अर्श के तारे तोड़ के लाएँ काविश लोग हज़ार करें
इब्न-ए-इंशा
तूफ़ाँ कोई नज़र में न दरिया उबाल पर
हुसैन माजिद
सुबूत-ए-जुर्म न मिलने का फिर बहाना किया
हुसैन ताज रिज़वी
फिर तिरा शहर तिरी राहगुज़र हो कि न हो
हुसैन ताज रिज़वी
है मेरे गिर्द यक़ीनन कहीं हिसार सा कुछ
हुसैन ताज रिज़वी
किरन किरन के दरख़्शंदा बाब मेरे हैं
हुसैन सहर
रौशनी में खोई गई रौशनी
हुसैन आबिद
खड्डियों पर बने लोग
हुसैन आबिद
कभी वफ़ूर-ए-तमन्ना कभी मलामत ने
हुसैन आबिद
यगानगी में भी दुख ग़ैरियत के सहता हूँ
हुरमतुल इकराम
वो दिल समो ले जो दामन में काएनात का कर्ब
हुरमतुल इकराम
वो दिल जो था किसी के ग़म का महरम हो गया रुस्वा
हुरमतुल इकराम