Hope Poetry (page 202)
हक़ मिरा मुझ को मिरे यार नहीं देते हैं
अब्दुश्शुकूर आसी
ये कौन मेरे अलावा मिरे वजूद में है
अब्दुर्राहमान वासिफ़
मेज़ क़लम क़िर्तास दरीचा सन्नाटा
अब्दुर्राहमान वासिफ़
मज़ीद कुछ नहीं बोला मैं हो गया ख़ामोश
अब्दुर्राहमान वासिफ़
फ़रेब-ए-ज़ार मोहब्बत-नगर खुला हुआ है
अब्दुर्राहमान वासिफ़
अगर तुम रोक दो इज़हार-ए-लाचारी करूँगा
अब्दुर्राहमान वासिफ़
लाहौर के नाम
अब्दुर्रशीद
चुप
अब्दुर्रशीद
देख रहा था जाते जाते हसरत से
अब्दुर्रहीम नश्तर
वो शख़्स जिस ने ख़ुद अपना लहू पिया होगा
अब्दुर्रहीम नश्तर
सफ़ेद-पोश दरिंदों ने गुल खिलाए थे
अब्दुर्रहीम नश्तर
पंछियों के रू-ब-रू क्या ज़िक्र-ए-नादारी करूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
मैं तेरी चाह में झूटा हवस में सच्चा हूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
इन काली सड़कों प अक्सर ध्यान आया
अब्दुर्रहीम नश्तर
अगर हो ख़ौफ़-ज़दा ताक़त-ए-बयाँ कैसी
अब्दुर्रहीम नश्तर
गुलचीं बहार-ए-गुल में न कर मन-ए-सैर-ए-बाग़
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
पड़े हैं मस्त भी साक़ी अयाग़ के नज़दीक
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
पाबंद हर जफ़ा पे तुम्हारी वफ़ा के हैं
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
न पहुँचे छूट कर कुंज-ए-क़फ़स से हम नशेमन तक
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
मिज़्गाँ ने रोका आँखों में दम इंतिज़ार से
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
क्या कीजिए रक़म सनद-ए-एहतिशाम-ए-ज़ुल्फ़
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
दिल दिया वहशत लिया और ख़ुद को रुस्वा कर लिया
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
वादा-ए-वस्ल है लज़्ज़त-ए-इंतिज़ार उठा
अब्दुल्लाह कमाल
उस की जाम-ए-जम आँखें शीशा-ए-बदन मेरा
अब्दुल्लाह कमाल
अपने होने का इक इक पल तजरबा करते रहे
अब्दुल्लाह कमाल
याद यूँ होश गँवा बैठी है
अब्दुल्लाह जावेद
कोई रिश्ता न हो फिर भी रिश्ते बहुत
अब्दुल्लाह जावेद
जो गुज़रता है गुज़र जाए जी
अब्दुल्लाह जावेद
इक सैल-ए-बे-पनाह की सूरत रवाँ है वक़्त
अब्दुल्लाह जावेद
दुनिया ने जब डराया तो डरने में लग गया
अब्दुल्लाह जावेद