Hope Poetry (page 201)
कहीं से बास नए मौसमों की लाती हुई
आबिद सयाल
कहीं से बास नए मौसमों की लाती हुई
आबिद सयाल
कफ़-ए-ख़िज़ाँ पे खिला मैं इस ए'तिबार के साथ
आबिद सयाल
लाला-ज़ारों में ज़र्द फूल हूँ मैं
आबिद मुनावरी
ख़ुद सवाल आप ही जवाब हूँ मैं
आबिद मुनावरी
जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए
आबिद मुनावरी
बे-तमन्ना हूँ ख़स्ता-जान हूँ मैं
आबिद मुनावरी
अगले पड़ाव पर यूँही ख़ेमा लगाओगे
आबिद मुनावरी
ज़ख़्म और पेड़ ने इक साथ दुआ माँगी है
आबिद मलिक
शहर से जब भी कोई शहर जुदा होता है
आबिद मलिक
हज़ार ता'ने सुनेगा ख़जिल नहीं होगा
आबिद मलिक
किसे ख़बर थी कि ख़ुद को वो यूँ छुपाएगा
आबिद ख़ुर्शीद
न हो हयात का हासिल तो बंदगी क्या है
आबिद काज़मी
जिन्हें था फ़ख़्र नवाब-ओ-नजीब होते हैं
आबिद काज़मी
इल्तिजा है इज्ज़-ओ-उसरत कुन-फ़कानी और है
आबिद काज़मी
आलम-ए-ख़्वाब सही ख़्वाब में चलते रहिए
आबिद करहानी
श्याम गोकुल न जाना कि राधा का जी अब न बंसी की तानों पे लहराएगा
आबिद हशरी
न कर्ब-ए-हिज्र न कैफ़्फ़ियत-ए-विसाल में हूँ
आबिद हशरी
किसी मक़ाम पे हम को भी रोकता कोई
आबिद आलमी
जब से अल्फ़ाज़ के जंगल में घिरा है कोई
आबिद आलमी
जो कहते हैं किधर दीवानगी है
आबिद अख़्तर
जो अपने आप को सब कुछ समझ ले
आबिद अख़्तर
ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में
अभिषेक शुक्ला
फ़सील-ए-जिस्म गिरा दे मकान-ए-जाँ से निकल
अभिषेक शुक्ला
दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें
अभिषेक शुक्ला
चलते हुए मुझ में कहीं ठहरा हुआ तू है
अभिषेक शुक्ला
एक ख़्वाहिश है बस जमाने की
अभिषेक कुमार अम्बर
पत्ते पत्ते से नग़्मा-सरा कौन है
अब्दुस्समद ’तपिश’
अगर वो बे-अदब है बे-अदब लिख
अब्दुस्समद ’तपिश’
आँख थी सूजी हुई और रात भर सोया न था
अब्दुस्समद ’तपिश’