Hope Poetry (page 76)
मुझे रुतबा-ए-ग़म बताना पड़ेगा
फ़ना निज़ामी कानपुरी
झूटी ही तसल्ली हो कुछ दिल तो बहल जाए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
हुस्न का एक आह ने चेहरा निढाल कर दिया
फ़ना निज़ामी कानपुरी
डूबने वाले की मय्यत पर लाखों रोने वाले हैं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
चेहरा-ए-सुब्ह नज़र आया रुख़-ए-शाम के बाद
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ये तमन्ना है कि इस तरह मुसलमाँ होता
फ़ना बुलंदशहरी
वो और होंगे जिन को हरम की तलाश है
फ़ना बुलंदशहरी
उन के जल्वों पे हमा-वक़्त नज़र होती है
फ़ना बुलंदशहरी
तुझे ढूँढती हैं नज़रें मुझे इक झलक दिखा जा
फ़ना बुलंदशहरी
तेरे दर से न उठा हूँ न उठूँगा ऐ दोस्त
फ़ना बुलंदशहरी
तिरा ग़म रहे सलामत यही मेरी ज़िंदगी है
फ़ना बुलंदशहरी
मिरी लौ लगी है तुझ से ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे
फ़ना बुलंदशहरी
मिरे दाग़-ए-दिल वो चराग़ हैं नहीं निस्बतें जिन्हें शाम से
फ़ना बुलंदशहरी
मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
फ़ना बुलंदशहरी
किस को सुनाऊँ हाल-ए-ग़म कोई ग़म-आश्ना नहीं
फ़ना बुलंदशहरी
कहीं सुकूँ न मिला दिल को बज़्म-ए-यार के बा'द
फ़ना बुलंदशहरी
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया
फ़ना बुलंदशहरी
जल्वा जो तिरे रुख़ का एहसास में ढल जाए
फ़ना बुलंदशहरी
हरम है क्या चीज़ दैर क्या है किसी पे मेरी नज़र नहीं है
फ़ना बुलंदशहरी
हर घड़ी पेश-ए-नज़र इश्क़ में क्या क्या न रहा
फ़ना बुलंदशहरी
हाँ वही इश्क़-ओ-मोहब्बत की जिला होती है
फ़ना बुलंदशहरी
बा-होश वही हैं दीवाने उल्फ़त में जो ऐसा करते हैं
फ़ना बुलंदशहरी
अँधेरे लाख छा जाएँ उजाला कम नहीं होता
फ़ना बुलंदशहरी
ऐ हम-सफ़रो क्यूँ न यहीं शहर बसा लें
फख्र ज़मान
लम्हों का भँवर चीर के इंसान बना हूँ
फख्र ज़मान
कुछ बात नहीं जिस्म अगर मेरा जला है
फख्र ज़मान
जो धूप की तपती हुई साँसों से बची सोच
फख्र ज़मान
ये जो लाहौर से मोहब्बत है
फख़्र अब्बास
ग़ज़लें लिख लिख पागल होने वाला हूँ
फख़्र अब्बास
चेहरे से कब अयाँ है मिरे इज़्तिरार भी
फख़्र अब्बास