Love Poetry (page 11)
जब शाख़-ए-तमन्ना पे कोई फूल खिला है
इक़बाल मिनहास
उस को नग़्मों में समेटूँ तो बुका जाने है
इक़बाल मतीन
कितने ही लोग दिल तलक आ कर गुज़र गए
इक़बाल मतीन
ज़ीस्त तकरार-ए-नफ़स हो जैसे
इक़बाल माहिर
राह दोनों की वही है सामना हो जाएगा
इक़बाल माहिर
रात तारीक रास्ते ख़ामोश
इक़बाल माहिर
नज़र नज़र में तमन्ना क़दम क़दम पे गुरेज़
इक़बाल माहिर
हस्ब-ए-मामूल आए हैं शाख़ों में फूल अब के बरस
इक़बाल माहिर
गुल की ख़ुश्बू की तरह आँख के आँसू की तरह
इक़बाल माहिर
अज्नबिय्यत का हर इक रुख़ पे निशाँ है यारो
इक़बाल माहिर
चश्म-ए-ख़ाना मक़ाम-ए-दर्द का है
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
बंद आँखों में सारा तमाशा देख रहा था
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
बख़्शे न गए एक को बख़्शा न कभी
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
आँखों के चराग़ वारते हैं
इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी
ज़ियान-ए-दिल ही इस बाज़ार में सूद-ए-मोहब्बत है
इक़बाल कौसर
तिरी पहली दीद के साथ ही वो फ़ुसूँ भी था
इक़बाल कौसर
रवाँ हूँ मैं
इक़बाल कौसर
मुज़ाहिमतों के अहद-निगार
इक़बाल कौसर
सुपुर्द-ए-ग़म-ज़दगान-ए-सफ़-ए-वफ़ा हुआ मैं
इक़बाल कौसर
करें हिजरत तो ख़ाक-ए-शहर भी जुज़-दान में रख लें
इक़बाल कौसर
काहिश-ए-ग़म ने जिगर ख़ून किया अंदर से
इक़बाल कौसर
कभी आइने सा भी सोचना मुझे आ गया
इक़बाल कौसर
जो ज़ख़्म जम्अ किए आँख-भर सुनाता हूँ
इक़बाल कौसर
जिस तरह लोग ख़सारे में बहुत सोचते हैं
इक़बाल कौसर
अभी मिरा आफ़्ताब उफ़ुक़ की हुदूद से आश्ना नहीं है
इक़बाल कौसर
मैं ऐसे हुस्न-ए-ज़न को ख़ुदा मानता नहीं
इक़बाल कैफ़ी
देखा है मोहब्बत को इबादत की नज़र से
इक़बाल कैफ़ी
अटे हुए हैं फ़क़ीरों के पैरहन 'कैफ़ी'
इक़बाल कैफ़ी
यही नहीं कि निगाहों को अश्क-बार किया
इक़बाल कैफ़ी
सुना है उस ने ख़िज़ाँ को बहार करना है
इक़बाल कैफ़ी