Love Poetry (page 162)

ग़म हमारा गुलाब हो जाए

दिनेश ठाकुर

आइने से कब तलक तुम अपना दिल बहलाओगे

दिनेश ठाकुर

ज़माने ठीक है इन से बहुत हुए रौशन

दिनेश नायडू

पूछता कौन वफ़ा से उस की

दिनेश नायडू

मुझ में आबाद सराबों का इलाक़ा करने

दिनेश नायडू

मिरे कमरे में पूरी चाँदनी है

दिनेश नायडू

मिरा ये मलबा मिरा ख़राबा तुम्हारी यादों से लड़ रहा है

दिनेश नायडू

किस के सपनों से मिरी नींद सजी रहती है

दिनेश नायडू

जो भी निकले तिरी आवाज़ लगाता निकले

दिनेश नायडू

इक हरे ख़त में कोई बात पुरानी पढ़ना

दिनेश नायडू

डरा रहे हैं ये मंज़र भी अब तो घर के मुझे

दिनेश नायडू

चाक पर मिट्टी को मर जाना है

दिनेश नायडू

चाँद भी सितारों को साथ ले के चलता है

दिलकश सागरी

रवानी ग़म की जिस में थी वो जौहर दे दिया मैं ने

दिलदार हाश्मी

मैं ने जब से चाहत के जुगनुओं को पाला है

दिलदार हाश्मी

जब कोई ज़ख़्म उभरता है किनारों जैसा

दिलदार हाश्मी

साहब ये चाहते हैं मैं हर हुक्म पर कहूँ

दिलावर फ़िगार

जो हल्दी से मोहब्बत है तो यारो

दिलावर फ़िगार

तरही ग़ज़ल

दिलावर फ़िगार

तमाशा मिरे आगे

दिलावर फ़िगार

शदीद गरमी के मौसम में मुशाइरा

दिलावर फ़िगार

साबिक़ वज़ीर

दिलावर फ़िगार

रिश्वत-ख़ोर सरकारी मुलाज़मीन

दिलावर फ़िगार

मौसीक़ी से इलाज

दिलावर फ़िगार

मर्दुम-गज़ीदा इंसान का इलाज

दिलावर फ़िगार

लैला मजनूँ की शादी

दिलावर फ़िगार

लग गए हैं फ़ोन लगने में जो पच्चीस साल

दिलावर फ़िगार

कराची की बस

दिलावर फ़िगार

कहा लैला की माँ ने

दिलावर फ़िगार

इश्क़ का परचा

दिलावर फ़िगार